












































Awareness Program on World Occupational Therapy Day by Lohiya Institute Lucknow
लखनऊ। डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान लखनऊ के फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैबिलिटेशन विभाग द्वारा संस्थान के आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ के सहयोग से विश्व ऑक्यूपेशनल थेरेपी दिवस 26 मनाया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य ऑक्यूपेशनल थेरेपी की भूमिका के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा दिव्यांगजनों एवं अस्थायी या स्थायी दिव्यांगता से प्रभावित व्यक्तियों की स्वतंत्रता आत्मनिर्भरता और सामाजिक सहभागिता को प्रोत्साहित करना था। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि संस्थान के निदेशक प्रो. डॉ सीएम सिंह उपस्थित नहीं हो सके। विशिष्ट अतिथि संस्थान के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो. डॉ. विक्रम सिंह उपस्थित रहे। कार्यक्रम में लोहिया विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. वी. एस. गोगिया एसो प्रोफेसर डॉ. यशवीर सिंह डॉ. स्निग्धा मिश्रा फैकल्टी इंचार्जऑक्यूपेशनल थेरेपी असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अमित रंजन तथा वरिष्ठ ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट अनंत कुमार सहित अन्य चिकित्सा एवं पुनर्वास विशेषज्ञ उपस्थित रहे।
डॉ. यशवीर ने कहा स्वास्थ्य सेवाओं का लक्ष्य केवल रोगों का उपचार करना नहीं, बल्कि व्यक्ति की कार्यक्षमता स्वतंत्रता और जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाना भी है। व्यापक पुनर्वास सेवाओं में फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैबिलिटेशन विभाग तथा ऑक्यूपेशनल थेरेपी सहित विभिन्न पुनर्वास विशेषज्ञताओं के समन्वित योगदान को महत्वपूर्ण बताया गया। अकादमिक उत्कृष्टता नैदानिक सेवाओं अनुसंधान और नवाचार के माध्यम से ऐसे पुनर्वास मॉडल विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया, जो दिव्यांगजनों एवं कार्यात्मक सीमाओं से प्रभावित व्यक्तियों को अधिक आत्मनिर्भर और सम्मानजनक जीवन जीने में सक्षम बनाएं।
कार्यक्रम का शुभारंभ लोहिया के विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. वी. एस. गोगिया के स्वागत संबोधन से हुआ। उन्होंने विश्व ऑक्यूपेशनल थेरेपी दिवस के आयोजन के महत्व पर कहा ऐसे आयोजन ऑक्यूपेशनल थेरेपी के प्रति जागरूकता बढ़ाने, इसके योगदान को पहचानने तथा पुनर्वास सेवाओं में विभिन्न विशेषज्ञताओं के बीच सहयोग को सुदृढ़ करने का अवसर प्रदान करते हैं। उन्होंने व्यापक एवं व्यक्ति-केंद्रित पुनर्वास सेवाओं में ऑक्यूपेशनल थेरेपी की महत्वपूर्ण भूमिका तथा दैनिक जीवन में स्वतंत्रता और सामाजिक सहभागिता को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया।कार्यक्रम के प्रारंभिक सत्र में अनंत कुमार वरिष्ठ ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट ने ऑक्यूपेशनल थेरेपी की अवधारणा इसके प्रमुख कार्यक्षेत्रों तथा सामान्य नैदानिक अनुप्रयोगों का परिचय दिया। उन्होंने बताया ऑक्यूपेशनल थेरेपी विभिन्न स्वास्थ्य स्थितियों से प्रभावित व्यक्तियों को दैनिक जीवन की गतिविधियाँ अधिक स्वतंत्रता और प्रभावशीलता के साथ करने में सक्षम बनाने पर केंद्रित है।
इसके प्रमुख कार्यक्षेत्रों में स्वयं की देखभाल, दैनिक गतिविधियों का प्रशिक्षण, कार्यात्मक क्षमता में सुधार तथा व्यक्ति को पारिवारिक, शैक्षणिक, व्यावसायिक और सामाजिक जीवन में सक्रिय भागीदारी के लिए तैयार करना शामिल है। डॉ. स्निग्धा मिश्रा असिस्टेंट प्रोफेसर एवं ऑक्यूपेशनल थेरेपी की फैकल्टी इंचार्ज ने जीवन के वर्षों में सार्थकता जोड़ने की अवधारणा पर बताया कि पुनर्वास का उद्देश्य केवल जीवन की अवधि बढ़ाना नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक वर्ष को अधिक सार्थक, सक्रिय और गुणवत्तापूर्ण बनाना भी है। उन्होंने ऑक्यूपेशनल थेरेपी की भूमिका को रेखांकित करते हुए बताया यह व्यक्तियों को उनकी दैनिक गतिविधियों, रुचियों और सामाजिक भूमिकाओं में भागीदारी के लिए सक्षम बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
डॉ. यशवीर सिंह, एसो प्रोफेसर ने दैनिक जीवन की गतिविधियों में आत्मनिर्भरता के महत्व पर जोर देते हुए बताया पुनर्वास की सफलता का महत्वपूर्ण मापदंड यह है कि व्यक्ति अपनी दैनिक गतिविधियाँ यथासंभव स्वतंत्र रूप से कर सके। स्वयं की देखभाल कपड़े पहनना भोजन करना और अन्य आवश्यक कार्यों में आत्मनिर्भरता व्यक्ति के आत्मविश्वास, गरिमा और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने संस्थान में भविष्य में निर्मित होने वाले भवनों में सार्वभौमिक सुगम्यता के मानकों को प्रारंभिक योजना और अभिकल्पना के चरण से ही शामिल करने की आवश्यकता पर भी बल दिया, ताकि दिव्यांगजन वरिष्ठ नागरिक तथा सीमित गतिशीलता वाले व्यक्ति संस्थान की सुविधाओं का सुरक्षित, समान और स्वतंत्र रूप से उपयोग कर सकें।
विशिष्ट अतिथि प्रो. डॉ. विक्रम सिंह मुख्य चिकित्सा अधीक्षक ने आश्वस्त किया कि भविष्य में संस्थान के भवनों में सुगम्यता मानकों के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए विशेषज्ञों को संबंधित समितियों में शामिल करने की दिशा में आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। उन्होंने संस्थान के भौतिक वातावरण को अधिक समावेशी और सुलभ बनाने के लिए भवनों की योजना एवं निर्माण प्रक्रिया में सुगम्यता को प्राथमिकता देने के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा युवा संकाय सदस्यों को शैक्षणिक गतिविधियों, नैदानिक सेवाओं और अनुसंधान के साथ नवाचार पर भी ध्यान देना चाहिए। ऐसे नवाचारों के माध्यम से अस्थायी या स्थायी दिव्यांगता से प्रभावित व्यक्तियों की वास्तविक समस्याओं के व्यावहारिक एवं प्रभावी समाधान विकसित किए जा सकते हैं।
इसका उद्देश्य मरीजों की कार्यक्षमता स्वतंत्रता और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना तथा पुनर्वास सेवाओं को अधिक प्रभावी सुलभ और व्यक्ति-केंद्रित बनाना होना चाहिए। कार्यक्रम में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि प्रभावी पुनर्वास एक बहुआयामी एवं समन्वित प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति की आवश्यकताओं के अनुरूप विभिन्न चिकित्सीय एवं पुनर्वास विधियों का उचित समन्वय आवश्यक है। फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैबिलिटेशन (क्करूक्र) एक ऐसी विशेषज्ञता है, जो विभिन्न पुनर्वास सेवाओं को एकीकृत करते हुए प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताओं, कार्यात्मक सीमाओं और पुनर्वा







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