











































प्रतीकात्मक
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डॉ. संजीव सैगल |
नयी दिल्ली। पत्नी को आटो इम्युन डिसआर्डर होने के कारण क्रोनिक लीवर रोग हो गया तो पति ने उसकी जिंदगी बचाने के लिए अपना लीवर उसे दान कर दिया। मैक्स हॉस्पिटल, साकेत के डॉक्टरों ने लीवर प्रत्यारोपण सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। लखनऊ की 41 वर्षीया शिक्षिका पिछले एक साल से आटोइम्युन सिरोसिस से जूझ रही थी और सभी तरह के उपाय करने के बावजूद उसकी स्थिति बिगड़ती ही जा रही थी। मैक्स हॉस्पिटल साकेत, दिल्ली में सेंटर आफ लीवर एंड बिलियरी साइंस के प्रमुख निदेशक और हीपैटोलॉजी एवं लीवर ट्रांसप्लांट के प्रमुख डॉ. संजीव सैगल ने कहा, 'मरीज की लगातार बिगड़ती हालत के कारण उसका लीवर ट्रांसप्लांट कराना ही एकमात्र विकल्प रह गया था। लीवर दान करने वाले की तलाश करना वाकई बहुत बड़ी चुनौती थी। खुशकिस्मती से उसके पति ही लीवर दान करने के लिए तैयार हो गए। सभी तरह की जांच और काउंसिलिंग के बाद मरीज में सफलतापूर्वक लीवर प्रत्यारोपित कर दिया गया। मरीज में |
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आश्चर्यजनक तरीके से रिकवरी भी हो गई और इम्युनोसप्रेसिव दवाइयों की मदद से प्रत्यारोपित किया गया लीवर अच्छी तरह काम करने लगा।' एसाइटिस, पीलिया और बार-बार हेपेटिक एनसेप्लापैथी के रूप में मरीज का लीवर बहुत हद तक खराब हो चुका था। ऐसा उसके आए दिन अपनी लाइफस्टाइल और दिनचर्या से समझौता करते रहने के कारण हो गया था और उसकी स्थिति देखकर नहीं लगता था कि वह कुछ महीनों से ज्यादा जिंदा रह पाएगी। मरीज के आपरेशन के बाद पित्त संबंधी कई समस्याएं भी आई और उसे लेपरोटोमी और हीपाटिकोजेजनोस्टोमी की भी जरूरत पड़ी। मरीज की स्थिति को देखते हुए उसे परक्यूटेनियस बिलियरी इंटरवेंशन और कई स्टेंट भी दिए गए जिसे उसने अच्छी तरह बर्दाश्त किया और अब पूरी तरह सक्रिय जीवन में लौट आई है। मरीज को डॉ. सैगल और डॉ. गुप्ता की सख्त निगरानी में रखा गया और अब वह पूरी तरह स्वस्थ है तथा अपने जीवन से जुड़े सभी कार्यों को बखूबी अंजाम दे रही है। यह केस बताता है कि एक सफल एलडीएलटी कैसे वरदान साबित हुआ है और आखिरी चरण के लीवर मरीजों को भी दीर्घायु बना देता है। हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी, अल्कोहल और नॉन-अल्कोहलिक फैटी लीवर जैसी बीमारियां देश में क्रोनिक लीवर रोग के सबसे बड़े कारण हैं। वहीं अन्य कारणों में आटोइम्युन लीवर रोग (जैसाकि इस महिला को था) के कारण लीवर का खराब होना आखिरी चरण तक पहुंच सकता है और शुरुआत में यदि इसकी पहचान तथा इलाज नहीं होने पर लीवर ट्रांसप्लांट ही आखिरी विकल्प रह जाता है।
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