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अपोलोमेडिक्स ने रचा इतिहास प्रदेश में पहली बार लैब में तैयार सेल्स से यूरिथ्रल स्ट्रिक्चर का सफल इलाज

डॉ. वेद भास्कर ने कहा पुरुषों में पेशाब की नली के सिकुड़ने की समस्या संक्रमण चोट या पहले किए गए किसी इलाज के कारण हो सकती है। यह नई तकनीक हर मरीज के लिए उपयुक्त नहीं है, लेकिन सही मरीजों में इसकी सफलता दर 70 से 80 प्रतिशत तक है, जो पारंपरिक ओपन सर्जरी के बराबर मानी जाती है।

हुज़ैफ़ा अबरार
August 07 2026 Updated: August 07 2026 00:08
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अपोलोमेडिक्स ने रचा इतिहास प्रदेश में पहली बार लैब में तैयार सेल्स से यूरिथ्रल स्ट्रिक्चर का सफल इलाज Dr. Mayank Agarwal, Dr. Ved Bhaskar and Dr. Shailendra Gupt
लखनऊ।  उत्तर प्रदेश में पहली बार लखनऊ के अपोलोमेडिक्स अस्पताल ने यूरिथ्रल स्ट्रिक्चर यानी पेशाब की नली के सिकुड़ जाने की समस्या से जूझ रहे एक मरीज का लैब में तैयार किए सेल्स की मदद से सफल इलाज किया है। डॉ. मयंक अग्रवाल, डॉ. वेद भास्कर और डॉ. शैलेंद्र गुप्ता की सर्जिकल टीम ने 30 वर्षीय मरीज का एडवांस्ड तकनीक से ऑपरेशन किया, जिसमें टिश्यू इंजीनियरिंग के जरिए लैब में तैयार किए गए सेल्स का इस्तेमाल किया गया। उत्तर प्रदेश में इस तकनीक का पहली बार उपयोग किया गया है। लखनऊ निवासी यह मरीज तीन सेंटीमीटर लंबी बुलबर यूरिथ्रा स्ट्रिक्चर से पीड़ित था। यह तकनीक यूरिथ्रल स्ट्रिक्चर के चुनिंदा मरीजों के लिए कम चीरफाड़ वाला एक नया और प्रभावी इलाज का विकल्प है। आमतौर पर इस बीमारी के इलाज के लिए डॉक्टर बक्कल म्यूकोसा ग्राफ्ट यूरेथ्रोप्लास्टी (बीएमजीयू) की सलाह देते हैं। इस सर्जरी में मरीज के मुंह के अंदर से करीब पांच से छह सेंटीमीटर टिशू निकालना पड़ता है। इसके कारण मरीज को कई सप्ताह तक खाने और पीने में परेशानी होती है तथा गरम और मसालेदार भोजन से भी परहेज़ करना पड़ता है।
इस बीमारी के इलाज का दूसरा विकल्प एंडोस्कोपिक या ऑप्टिकल इंटरनल यूरेथ्रोटॉमी है। इस प्रक्रिया में बीमारी दोबारा होने की आशंका अधिक रहती है। ऐसे मामलों में मरीज को लंबे समय तक स्वयं कैथेटर डालना पड़ सकता है, जिससे दर्द खून आने और संक्रमण का खतरा बना रहता है। युवा मरीज इन दोनों प्रक्रियाओं से बचना चाहता था और किसी आधुनिक और कम चीरफाड़ वाले इलाज की तलाश में था। इस चुनौती को स्वीकार करते हुए डॉ. वेद भास्कर ने अपनी टीम के साथ विचार-विमर्श के बाद मरीज को आधुनिक सेल थेरेपी तकनीक का सुझाव दिया। इसके लिए मरीज के गाल के अंदर से केवल 10 मिलीमीटर लंबा और 5 मिलीमीटर चौड़ा एक छोटा सा ऊतक लिया गया। उसी समय वहां टांके लगा दिए, जिससे कोई खुला घाव नहीं रहा। इसका फायदा यह हुआ कि मरीज पहले ही दिन से सामान्य भोजन कर सका। उन्होंने बताया यह प्रक्रिया सभी उम्र के मरीजों और एक साथ कई स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त रोगियों के लिए अत्यंत लाभकारी है, क्योंकि इसमें बड़े सर्जिकल चीरे लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिससे मरीज जल्दी स्वस्थ हो जाता है और पारंपरिक सर्जरी की तुलना में दर्द एवं असुविधा भी काफी कम होती है।
मुंह से लिए गए इस छोटे से टिशू को हवाई मार्ग से पुणे की एक विशेष लैब में भेजा गया। वहां अगले दो सप्ताह तक टिशू इंजीनियरिंग की मदद से इसे विकसित कर करीब 50 लाख सेल्स तैयार किए गए। इन सेल्स की उपयोग अवधि केवल 72 घंटे होती है, इसलिए इन्हें आवश्यक कोल्ड चेन बनाए रखते हुए पूरी सुरक्षा के साथ वापस लखनऊ लाया गया। अगले ही दिन डॉ. वेद भास्कर ने इन तैयार सेल्स को लिक्विड थ्रोम्बिन के साथ मिलाकर दूरबीन की सहायता से सीधे सिकुड़े हुए हिस्से पर लगाया। इससे पहले उस स्थान को हल्का सा तैयार किया गया ताकि सेल्स वहां अच्छी तरह चिपक सकें। इसके बाद ये सेल्स घाव भरने की प्राकृतिक प्रक्रिया को बढ़ावा देते हैं और दोबारा निशान बनने या नली के फिर से सिकुड़ने की संभावना को कम करते हैं। पुरानी तकनीकों की तुलना में इस नई प्रक्रिया के फायदे बताते हुए अपोलोमेडिक्स अस्पताल, लखनऊ के डायरेक्टर एवं हेड, यूरोलॉजी और किडनी ट्रांसप्लांट, डॉ. मयंक मोहन अग्रवाल ने कहा, "इस तकनीक में मरीज के शरीर पर कोई बड़ा चीरा नहीं लगाया जाता। मुंह के अंदर भी केवल एक बहुत छोटा नमूना लिया जाता है, जिससे मरीज पहले दिन से सामान्य भोजन कर सकता है। पूरी प्रक्रिया 15 से 20 मिनट में पूरी हो जाती है। जहां सामान्य ओपन सर्जरी में मरीज को दो से तीन सप्ताह तक कैथेटर रखना पड़ता है, वहीं इस तकनीक में इसे केवल एक सप्ताह बाद हटाया जा सकता है।
मरीज की हालत अच्छी रही और वह अगले ही दिन अस्पताल से छुट्टी पाने के लिए तैयार था। बीमारी के बारे में जानकारी देते हुए अपोलोमेडिक्स अस्पताल के एसोसिएट डायरेक्टर, यूरोलॉजी डॉ. वेद भास्कर ने कहा पुरुषों में पेशाब की नली के सिकुड़ने की समस्या संक्रमण, चोट या पहले किए गए किसी इलाज के कारण हो सकती है। यह नई तकनीक हर मरीज के लिए उपयुक्त नहीं है, लेकिन सही मरीजों में इसकी सफलता दर 70 से 80 प्रतिशत तक है, जो पारंपरिक ओपन सर्जरी के बराबर मानी जाती है। इस उपलब्धि पर खुशी जताते हुए अपोलोमेडिक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल लखनऊ के एमडी एवं सीईओ डॉ. मयंक सोमानी ने कहा अपोलोमेडिक्स हमेशा मरीजों तक विश्वस्तरीय और अत्याधुनिक इलाज पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है। लैब में तैयार सेल्स पर आधारित यह तकनीक कम चीरफाड़ वाले इलाज की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है। इससे मरीजों को कम दर्द होता है, रिकवरी तेज होती है और वे जल्द सामान्य जीवन में लौट पाते हैं।

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