












































प्रतीकात्मक
न्यूयॉर्क। भारत ने मातृ मृत्यु दर, नवजात मृत्यु दर और 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु को कम करने पर महत्वपूर्ण कदम उठाये हैं। 2020 में मातृ मृत्यु दर 1 लाख में से घटकर 97 हुई तो वहीं नवजात मृत्यु दर 1000 जन्म लेने वाले बच्चों पर 20 और 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 1000 जीवित बच्चों में 32 हो गई है।
चिंता का विषय है कि जिस दिन डिलीवरी होती है, उसी वक्त लगभग 40% नवजात शिशुओं और आधी माताओं की मृत्यु हो जाती है। इन मौतों को कम करने की दिशा में भारत तीन मापदंडों में एसडीजी (SDG) 2030 के लक्ष्य को लेकर चल रहा है। जिसमें दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाली सबसे कमजोर और हाशिए पर रहने वाली आबादी तक पहुंचना लक्ष्य होगा। इसका उद्देश्य गुणवत्ता पूर्ण प्रजनन, मातृ, नवजात, बाल और किशोर स्वास्थ्य (RMNCHA) सेवाओं की सुविधाएं सुनिश्चित करना है।
हालाँकि, यह अहम कदम उठाये जाने के बावजूद चुनौतियाँ अब भी बरकरार हैं। भारत दुनिया में 5 साल से कम उम्र में होने वाली मौतों के मामले में छठे और नवजात शिशुओं की लगभग एक चौथाई मौतों का बोझ उठाता है। भारत में प्रतिदिन 67,385 बच्चे जन्म लेते हैं, जो दुनिया में जन्म लेने वाले बच्चों का पांचवा हिस्सा है। प्रत्येक मिनट इनमें से एक नवजात शिशु (newborn) की मौत हो जाती है। सम्मिलित प्रयासों से जन्म के शुरुआती 28 दिनों में होने वाली नवजात मृत्यु (neonatal deaths) वैश्विक स्तर पर होने वाली मौतों के एक तिहाई से काफी कम होकर वैश्विक पर नवजात मृत्यु की एक चौथाई से भी कम हो गई है।
प्रसव का दिन मां और नवजात शिशु दोनों के लिए सबसे अधिक जोखिम भरा दिन होता है क्योंकि लगभग 40 प्रतिशत नवजात शिशु मृत्यु और आधी मातृत्व मृत्यु प्रसव के दिन ही होती है। इस तरह की मौतों की रोकथाम सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक महिला का किसी स्वास्थ्य सुविधा में और कुशल प्रसव परिचर द्वारा प्रसव कराया जाना सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में प्रतिवर्ष लगभग पांच मिलियन नवजात शिशुओं का जन्म घर पर होता है।
प्रसव के दौरान 47% मां की मृत्यू का कारण ज्यादा रक्तस्त्राव, 12% को गर्भावस्था संक्रमण तो 7% की मृत्यू गर्भावस्था में बीपी हाई की वजह से होने के प्रमुख कारण थे। अधिकांश नवजात शिशुओं की मृत्यु ऐसी वज़हों से होती हैं जिनका हम रोकथाम करना अथवा उपचार करना जानते हैं: इनमें शामिल हैं समय से पहले अथवा प्रसव और जन्म के दौरान होने वाली जटिलताएं, और सेप्सिस, निमोनिया, टेटनस और दस्त जैसे संक्रमण।
किशोर गर्भावस्था माँ और बच्चे दोनों के लिए जोखिमभरी होती है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में 20 से 24 आयु वर्ग की लगभग एक-चौथाई महिलाओं (23.3 प्रतिशत) की शादी 18 साल की होने से पहले हो जाती है और 6.8 प्रतिशत लड़कियां किशोरावस्था में ही बच्चों को जन्म देती हैं।
भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा बड़ा देश है जहां शिशु लड़कों की तुलना में शिशु लड़कियों की मृत्यु अधिक होती है। वर्तमान में बच्चों के जीवित रहने में लिंग अंतर 3 प्रतिशत है। यह भेदभाव लड़कियों के प्रतिकूल लिंगानुपात के साथ जन्म से पहले ही शुरू हो जाता है, जिसका अर्थ है लड़कियों की तुलना में अधिक लड़के पैदा होते हैं, और यह अंतर बच्चे के जीवन के सभी चरणों में जारी रहता है।
आंकड़े लड़कों की तुलना में लड़कियों को अस्पताल में कम भर्ती कराए जाने का सामुदायिक दृष्टिकोण दर्शाते हैं, जिससे पता चलता है कि माता-पिता कभी-कभी नवजात लड़की पर कम ध्यान देते हैं। अकेले 2017 में लड़कों की तुलना में 150,000 कम लड़कियों को SNCU में भर्ती कराया गया था।
यूनिसेफ प्रत्येक बच्चे और माता-पिता तक पहुंच बनाना सुनिश्चित करने के लिए देश भर में अपने मातृत्व, शिशु और नवजात स्वास्थ्य कार्यक्रमों को लागू करने के लिए भारत सरकार के साथ मिलकर काम कर रहा है। जिसमें देशभर के सबसे कमजोर समुदायों और हाशिए पर रहने वाली आबादी को भी शामिल किया जाएगा।
प्रत्येक बालिका के लिए स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं तक समान पहुंच की जरूरत के लिए, इस अंतर को पाटने के लिए हमें अपने संयुक्त प्रयासों को और तेज करने की आवश्यकता है। यहां तक कि MDG लक्ष्यों को पूरा करने वाले राज्यों में भी निरंतर लैंगिक असमानताएं देखी जा सकती हैं। भारत में पांच वर्ष से कम उम्र में लड़कियों की मृत्यु दर लड़कों की तुलना में 3.3 प्रतिशत अधिक है | वैश्विक स्तर पर यह लड़कों की तुलना में 11 प्रतिशत अधिक है।
यूनिसेफ (UNICEF) प्रत्येक बच्चे और माता-पिता तक पहुंच बनाना सुनिश्चित करने के लिए देश भर में अपने मातृत्व, शिशु और नवजात स्वास्थ्य कार्यक्रमों को लागू करने के लिए भारत सरकार के साथ मिलकर काम कर रहा है। जिसमें देशभर के सबसे कमजोर समुदायों और हाशिए पर रहने वाली आबादी को भी शामिल किया जाएगा।
प्रत्येक बालिका के लिए स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं तक समान पहुंच की जरूरत के लिए, इस अंतर को पाटने के लिए हमें अपने संयुक्त प्रयासों को और तेज करने की आवश्यकता है। यहां तक कि MDG लक्ष्यों को पूरा करने वाले राज्यों में भी निरंतर लैंगिक असमानताएं देखी जा सकती हैं। भारत में पांच वर्ष से कम उम्र में लड़कियों की मृत्यु दर लड़कों की तुलना में 3.3 प्रतिशत अधिक है | वैश्विक स्तर पर यह लड़कों की तुलना में 11 प्रतिशत अधिक है।
(स्रोत: UNIGME child survival Report 2022).







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