











































प्रतीकात्मक
लखनऊ। रीजेंसी हॉस्पिटल लखनऊ मे डिफेकेशन डिसऑर्डर (मल त्याग संबंधी बीमारियों) पर जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। डिफेकेशन डिसऑर्डर एक ऐसी स्थिति होती है जिसका अक्सर निदान नहीं हो पाता है, लेकिन अब इसे दीर्घकालिक कब्ज होने के एक बड़े मूक कारण के रूप में पहचाना जा रहा है।
इस समस्या पर बात करते हुए रीजेंसी हॉस्पिटल लखनऊ के कंसल्टेंट- गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एवं हेपेटोलॉजी डॉ. पीयूष कुमार ठाकुर ने कहा जब रूटीन दवाएं, फाइबर सप्लीमेंट्स और खानपान में बदलाव के बाद भी आराम नहीं मिलता तो कई मरीज़ निराश हो जाते हैं। ऐसे मामलों में अक्सर समस्या मल नहीं होती, बल्कि मल त्याग के दौरान श्रोणि तल की मांसपेशियों का खराब तालमेल होता है। डिससिनर्जिक डेफिकेशन एक कार्यात्मक समस्या है जिसे अगर खास तौर पर जांचा न जाए तो आसानी से दरकिनार किया जा सकता है।

एक बार जब बीमारी की सही पहचान हो जाती है, तो इलाज कहीं ज़्यादा लक्षित, प्रभावी और टिकाऊ हो जाता है। ऐसा होने से मरीज़ों को सामान्य मल त्याग करने में मदद मिलती है और उनकी जीवन की गुणवत्ता में काफी सुधार होता है। रीजेंसी के डॉक्टरों ने कहा कि कब्ज यानी अपच की बीमारी ख़राब डाइट, कम पानी पीने और शारीरिक गतिविधि की कमी की वजह से से होती है। हालांकि बहुत सारे मरीज़ अपनी जीवनशैली आदतों में बदलाव करने और दवाइयों के सेवन के बाद भी लक्षणों का अनुभव करते हैं। इस तरह के कई केसों में इसका आंतरिक मूल कारण डिससिनर्जिक डेफिकेशन (मलत्याग के दौरान आंत और पेल्विक मांशपेशियों का तालमेल न होना) होता है। यह एक ऐसी बीमारी होती है जिसमें मल त्याग के दौरान पेल्विक फ्लोर (श्रोणि तल) की मांसपेशियां ठीक से शिथिल नहीं होतीं, जिससे मल त्याग करना मुश्किल, अधूरा और कष्टदायक हो जाता है।
इस बीमारी से ग्रसित मरीज अक्सर मल त्याग के दौरान बहुत ज़्यादा ज़ोर लगाने, पेट पूरी तरह सा$फ न होने का लगातार एहसास, टॉयलेट में ज़्यादा समय बिताने, और कुछ केसों में मल निकालने के लिए उंगलियों का इस्तेमाल करने की शिकायत करते हैं। नैदानिक साक्ष्यों के अनुसार, क्रोनिक कब्ज़ वाले लगभग 40 से 50 प्रतिशत मरीज़ों को डिससिनर्जिक डेफिकेशन हो सकता है। इतनी ज़्यादा आम होने के बावजूद कम जागरूकता और मरीज़ों में पेट से जुड़ी समस्याओं पर बात करने में झिझक के कारण इस बीमारी का निदान नहीं हो पाता है।
मल त्याग से जुड़ी समस्याओं का सही पता लगाने के लिए रीजेंसी हॉस्पिटल, लखनऊ एनोरेक्टल मैनोमेट्री का इस्तेमाल करता है। यह एक खास नैदानिक जांच है, जिसमें रेक्टल पुश प्रेशर को मापा जाता है और मल त्याग के दौरान गुदा की मांसपेशियां की शिथिलता की जांच की जाती है। यह टेस्ट यह पता करने में मदद करता है कि मल त्याग के दौरान श्रोणि तल की मांसपेशियां सही से काम कर रही हैं या नहीं।
निदान के आधार पर मरीज़ों का इलाज बायोफीडबैक थेरेपी से किया जाता है। यह थेरेपी एक गैर चीरफाड़ वाला इलाज का तरीका है। यह मरीज़ों को वास्तविक समय में प्रतिक्रिया देता है ताकि वे सीख सकें कि मल त्याग के दौरान अवरोधिनी गुदा (एनल स्फिंक्टर) और श्रोणि तल की मांसपेशियों को कैसे शिथिल करें। यह थेरेपी आंतों के स्वाभाविक तालमेल को ठीक करने में मदद करती है और लैक्सेटिव पर लंबे समय तक निर्भरता को कम करती है।
इस जागरूकता पहल के माध्यम से रीजेंसी हॉस्पिटल लखनऊ लंबे समय से कब्ज की समस्या से ग्रसित खासकर वे लोग जो लैक्सेटिव पर बहुत ज़्यादा निर्भर हैं या जिनका इलाज बार-बार फेल हो रहा है, उनको समय पर मेडिकल जांच करवाने के लिए प्रोत्साहित करता है। डॉक्टर इस बात पर ज़ोर देते हैं कि शुरुआती जांच और सही इलाज से लंबे समय तक होने वाली परेशानी को रोका जा सकता है और मरीज़ों को शर्म या गलत जानकारी की वजह से इलाज में देरी करने से बचाया जा सकता है।







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