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प्रदेश में नवजात मृत्यु दर कम करने की तैयारी बन रही दूसरे राज्य के बच्चों के लिए संजीवनी

उत्तर प्रदेश में नवजात मृत्यु दर (आईएमआर) को और कम करने के लिए अपग्रेड की जा रही स्वास्थ्य इकाइयों का लाभ दूसरे राज्यों के बच्चों को भी मिल रहा है। लगातार नए विकसित हो रहे व अपग्रेड हो रहे सिक न्यूबार्न केयर यूनिट (एसएनसीयू), न्यूबार्न स्टेबलाइजेशन यूनिट (एनबीएसयू), सी-पैप मशीन के प्रयोग से प्रदेश में तो आईएमआर कम हुआ ही है, मध्यप्रदेश, राजस्थान जैसे दूसरे राज्यों के नवजातों की जान बचाने में भी यूपी की स्वास्थ्य इकाइयां मददगार साबित हो रही हैं।

हुज़ैफ़ा अबरार
May 04 2026 Updated: May 04 2026 14:40
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 प्रदेश में नवजात मृत्यु दर कम करने की तैयारी बन रही दूसरे राज्य के बच्चों के लिए संजीवनी health units currently being upgraded in Uttar Pradesh

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में नवजात मृत्यु दर (आईएमआर) को और कम करने के लिए अपग्रेड की जा रही स्वास्थ्य इकाइयों का लाभ दूसरे राज्यों के बच्चों को भी मिल रहा है। लगातार नए विकसित हो रहे व अपग्रेड हो रहे सिक न्यूबार्न केयर यूनिट (एसएनसीयू), न्यूबार्न स्टेबलाइजेशन यूनिट (एनबीएसयू), सी-पैप मशीन के प्रयोग से प्रदेश में तो आईएमआर कम हुआ ही है, मध्यप्रदेश, राजस्थान जैसे दूसरे राज्यों के नवजातों की जान बचाने में भी यूपी की स्वास्थ्य इकाइयां मददगार साबित हो रही हैं। आगरा के सरोजनी नायडू (एसएन) मेडिकल कालेज की ही मिसाल ले लीजिए। इस मेडिकल कालेज में हर साल मध्यप्रदेश व राजस्थान के तकरीबन 200 बच्चों को नवजीवन मिलता है। मेडिकल कॉलेज के एसएनसीयू के नोडल अधिकारी प्रो. नीरज यादव के मुताबिक यूपी के अलावा इन दोनों राज्यों के एक दर्जन जिलों से आए बच्चों का यहां इलाज किया जाता है।

राजस्थान के धौलपुर जिले से आई 27 वर्षीय सुमन ने बताया कि हमारे जनपद के कई बच्चों को एसएन मेडिकल कालेज में नया जीवन मिला है। यह बात मुझे पता थी। लिहाजा जन्म के छठे दिन जब बच्चे की तबियत खराब हुई तो हम उसे सीधे आगरा लेकर भागे। एसएन मेडिकल कॉलेज में 18 अप्रैल को बच्चे का इलाज शुरू हुआ। डॉक्टरों के मुताबिक बच्चे को संक्रमण हो गया था। उसे सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। बच्चे को सी-पैप सपोर्ट पर रखा गया। धीरे-धीरे बच्चा स्वस्थ हो गया और अपने घर चला गया। सुमन ने कहा कि एसएन मेडिकल कॉलेज जाना हमारे लिए भी वरदान साबित हुआ।

सुमन तो एक मिसाल भर है। प्रो. नीरज यादव बताते हैं कि राजस्थान के भरतपुर, धौलपुर और मध्य प्रदेश के भिंड व मुरैना से काफी बच्चे मेडिकल कालेज में आते हैं और उनका इलाज किया जाता है। उन्होंने बताया कि मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभाग में एक साल में लगभग 1800 मरीज भर्ती होते हैं, जिसमें एक प्रतिशत यानि लगभग 200 बच्चे दूसरे राज्यों के होते हैं। प्रो. नीरज ने बताया कि 25 प्रतिशत प्री-मैच्योर बच्चों की संख्या होती है। इसके अलावा 800 से 1000 ग्राम के कई बच्चे भी स्वस्थ होकर गए हैं। एसएन मेडिकल कॉलेज आगरा के आसपास के एक दर्जन जिलों के मरीजों को स्वास्थ्य लाभ प्रदान कर रहा है।

नोडल अधिकारी ने बताया कि एसएनसीयू में स्थापित सी-पैप मशीनें काफी उन्नत और किफायती तकनीक है, जिसके दुष्प्रभाव भी काफी कम हैं। सी-पैप द्वारा निश्चित अनुपात में ऑक्सीजन व हवा को नाक के जरिए फेंफड़ों तक पहुंचाया जाता है और बच्चे को सांस लेने में आसानी होती है। वेंटिलेटर की तुलना में सी-पैप के अधिक फायदे हैं। बच्चे की कंगारू मदर केयर (केएमसी) भी जल्दी शुरू हो जाती है। मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ.प्रशांत गुप्ता ने बताया कि एसएनसीयू में केवल आगरा ही नहीं बल्कि आसपास के जिलों एवं राजस्थान व मध्य प्रदेश के एक दर्जन जिलों से मरीज आते हैं। हमारी टीम नवजातों का उपचार करके उनकी जान बचा रहे हैं।


प्रदेश में लगातार सुदृढ़ हो रहीं बाल स्वास्थ्य सेवाएं
राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वे (एनएफएचएस-5) के अनुसार उत्तर प्रदेश में एक हजार में से 28 नवजात की मृत्यु विभिन्न कारणों से हो जाती है। इसको कम करने के लिए प्रदेश में इस वक्त 48 एसएनसीयू सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। एसएनसीयू में स्थापित सी-पैप मशीनें नवजातों के लिए वरदान साबित हो रही हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के महाप्रबंधक डॉ. मिलिंद वर्धन प्रदेश में नवजात मृत्यु दर को कम करने में सीपैप को गेम-चेंजिंग उपाय के रूप में देखते हैं। खासकर एसएनसीयू के भीतर, जहाँ सांस लेने में तकलीफ़ नवजात शिशुओं की मृत्यु का मुख्य कारण बनी हुई है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की निदेशक डॉ पिंकी जोवेल ने बताया कि पहले चरण में 48 एसएनसीयू के लिए 350 डाक्टरों कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया गया है। दूसरे चरण में बाकी बचे सभी 72 यूनिट में ट्रेनिंग व अन्य कार्य किए जाएंगे

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