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वयस्‍कों का टीकाकरण: मिथक बनाम सच्‍चाई

टीकों के बारे में जानकारी रखना और आम गलतफहमियों को दूर करना महत्‍वपूर्ण है, इसलिए आप अपने डॉक्‍टर से प्रतिरक्षण पर पूरी बातचीत करें।

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वयस्‍कों का टीकाकरण: मिथक बनाम सच्‍चाई

लंबी अवधि तक रोग प्रतिरोधक क्षमता बनाये रखने के लिये टीकाकरण रोकथाम की सबसे प्रभावी रणनीति है, लेकिन वयस्‍कों का प्रतिरक्षण उपेक्षित रहा है।
 
भारत में टीके का कम कवरेज होने के पीछे अपर्याप्‍त जागरूकता, आधिकारिक अनुशंसाओं के एक स्‍थापित निकाय का अभाव और टीके से हिचकिचाहट जैसे कारण हैं। उदाहरण के लिये, भारत में टीकों की उपलब्‍धता और वैश्विक अनुशंसाओं के बावजूद टाइफाइड के मामले बढ़ रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि वयस्कों को इसका प्रभावकारी प्रयोग करने के लिए निवारक समाधान के रूप में प्रतिरक्षण के प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है।
 
असोसिएशन ऑफ फिजिशियंस ऑफ इंडिया की वयस्‍कों के प्रतिरक्षण से जुड़ी अभी तक की पहली अनुशंसाएं भारत में वयस्‍कों के प्रतिरक्षण की आवश्‍यकता को उजागर करती हैं।
 
इन अनुशंसाओं पर टिप्‍पणी करते हुए, प्रोफेसर निर्मल कुमार गांगुली, भूतपूर्व डायरेक्‍टर जनरल, इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने कहा कि, “भारत में वयस्‍कों का प्रतिरक्षण कवरेज बढ़ाने की क्षमता है। प्रमाण-आधारित इन अनुशंसाओं को विकसित करने के लिये, हमने कार्डियोलॉजी से लेकर पल्‍मोनोलॉजी और गायनीकोलॉजी से लेकर नेफ्रोलॉजी तक की विभिन्‍न विशेषज्ञताओं वाले स्‍वास्‍थ्‍यरक्षा विशेषज्ञों का एक पैनल बनाया था। इसके परिणाम में ज्ञान का एक व्‍यापक निकाय मिला, जिसने भारत में वयस्‍कों के प्रतिरक्षण पर सर्वश्रेष्‍ठ पद्धतियों और भरोसेमंद सूचना की रूपरेखा दी। इन अनुशंसाओं के माध्‍यम से हम वयस्‍कों के टीकाकरण को तेज गति से सूचित किया जाना और अपनाया जाना सुनिश्चित करने के लिये प्रतिमान में बदलाव लाने की उम्‍मीद करते हैं।”
 
एबॉट इंडिया की मेडिकल डायरेक्‍टर डॉ. श्रीरूपा दास ने बताया कि, “टीकाकरण संक्रामक रोगों की रोकथाम करता है, जीवन की गुणवत्‍ता को लंबे समय तक ठीक रखता है, लेकिन वयस्‍कों के प्रतिरक्षण पर कम ध्‍यान दिया जाता है। एपीआई की अनुशंसाएं जागरूकता बढ़ाने और स्‍वास्‍थ्‍यरक्षा पेशेवरों को प्रमाण-आधारित सूचना से युक्‍त करने में मदद करेंगी, ताकि उन्‍हें टीके की अनुशंसा करने और लगाने में मार्गदर्शन मिल सके। एबॉट में हमारा लक्ष्‍य टीके से रूक सकने वाले रोगों से लोगों को बचाने के लिये जागरूकता उत्‍पन्‍न करना है, ताकि वे भरा-पूरा और स्‍वस्‍थ जी‍वन जी सकें।”
 
टीकों के बारे में जानकारी रखना और आम गलतफहमियों को दूर करना महत्‍वपूर्ण है, इसलिए आप अपने डॉक्‍टर से प्रतिरक्षण पर पूरी बातचीत करें!
 
नीचे टीकों से जुड़े 5 आम मिथक और उन्‍हें दूर करने के लिये तथ्‍य दिये जा रहे हैं :
 
मिथक 1 : टीके बच्‍चों के लिये होते हैं।
 
तथ्‍य: टीकों की अनुशंसा जीवन की विभिन्‍न अवस्‍थाओं में की जाती है। बचपन में लगने वाले टीकों का सुरक्षा प्रभाव बीतते समय के साथ चला जाता है, इसलिये बूस्‍टर शॉट्स की ताजा जानकारी रखना जरूरी है। तीव्र वैश्विकरण और अंतर्राष्‍ट्रीय यात्रा की आवृत्ति बढ़ने के साथ, वयस्‍कों में ऐसे रोगों से संक्रमित होने की संभावना बढ़ी है, जिन्‍हें टीकों से रोका जा सकता है, जैसे कि इंफ्लूएंज़ा, हेपेटाइटिस ए और बी, आदि। यह रोग वयस्‍कों को ज्‍यादा प्रभावित कर सकते हैं, सहरूग्‍णताओं को उत्‍तेजित कर सकते हैं और वयस्‍कों की मृत्यु दर बढ़ा सकते हैं।
 
ऐसे टीके हैं, जो आपको बचपन में नहीं लगे हों, लेकिन वयस्‍क होने पर लगवाने चाहिये, जैसे कि डिप्‍थेरिया, टीटनस, पर्टूसिस (डीपीटी) टीका, जो एक बूस्‍टर शॉट है, जिसकी अनुशंसा हर दस साल में एक बार लगवाने के लिये की जाती है।
 
मिथक 2 : सभी वयस्‍कों को टीकों की जरूरत नहीं होती है।
 
तथ्‍य : टीकाकरण पूरी आबादी के लिये सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य की एक महत्‍वपूर्ण रणनीति है, जिसमें स्‍वस्‍थ वयस्‍क भी आते हैं और कई टीकों की विश्‍वभर में अनुशंसा की जाती है। इनमें इंफ्लूएंज़ा, टाइफाइड और हेपेटाइटिस ए और बी के लिये टीके शामिल हैं। इन रोगों ने भारत में मौसमी महामारियों का रूप लिया था।
 
हीपैटाइटिस बी वन जैसे कतिपय ख़ास टीके की भी ज्यादा ज़रुरत है, विशेषकर जोखिम वाली आबादी के बीच जिनमें सहरूग्‍णताओं वाले लोग, स्‍वास्‍थ्‍यरक्षा प्रदाता, बुजुर्ग लोग और गर्भवती महिलाएं सम्मिलित हैं।
 
मिथक 3 : टीके अनावश्‍यक परेशानी दे सकते हैं और मुझे बीमार कर सकते हैं।
 
तथ्‍य : टीके फायदेमंद होते हैं और लंबी अवधि में रोगों और हानिकारक जटिलताओं से बचा सकते हैं। इस प्रकार वे स्‍वास्‍थ्‍य के लिये बेहतर परिणाम देते हैं, ताकि आप भरपूर और परेशानी के बिना जीवन जीएँ। इसके अलावा, टीकों से बीमारी नहीं होती है, हालाँकि थोड़े समय के लिये थोड़ा बुखार, दर्द और पीड़ा जैसे कुछ साइड इफेक्‍ट्स हो सकते हैं, जिनकी चिंता नहीं करनी चाहिये - वास्‍तव में यह टीके को शरीर द्वारा दी जाने वाली प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया होती है।
 
मिथक 4 : स्‍वाभाविक रूप से फ्लू होना टीका लगवाने से बेहतर है, जिससे मेरा प्रतिरक्षी तंत्र कमजोर हो जाएगा।
 
तथ्‍य : स्‍वाभाविक रूप से फ्लू होने का मतलब है आप संभावित गंभीर रोग के प्रति संवेदनशील हो रहे हैं, जिसके लक्षण हल्‍के से लेकर तीव्र तक हो सकते हैं, जैसे कि बुखार, जोड़ों में दर्द, खाँसी आदि। यह चिंताजनक जटिलताओं को उत्‍तेजित कर सकता है और निमोनिया, श्‍वसन की बाधा में तब्‍दील हो सकता है और प्राण भी ले सकता है, खासकर उन्‍हें, जो उच्‍च जोखिम में हैं। टीकाकरण आपको रोकथाम के योग्‍य रोगों से बचाने के लिये बहुत सुरक्षित विकल्प है और आपके प्रतिरक्षी तंत्र को मजबूत बनाता है।
 
मिथक 5 : मैंने पिछले साल इंफ्लूएंज़ा का टीका लगवाया था, इसलिये मुझे उसकी दोबारा जरूरत नहीं है।
 
तथ्‍य: इंफ्लूएंज़ा के वायरस लगातार बदल रहे हैं और इसलिये, डब्‍ल्‍यूएचओ वार्षिक आधार पर सबसे नये स्‍ट्रेन की पहचान कर उसके लिये अनुशंसाएं देता है। इस प्रकार, हर साल टीका लगवाना तेजी से अनुकूल बनने वाले इंफ्लूएंज़ा वायरसों के विरूद्ध इष्‍टतम और स्‍थायी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये महत्‍वपूर्ण है। यह जरूरी है, खासकर भारत को देखते हुए, जहाँ वर्ष 2012, 2015 और 2017 में राजस्‍थान, महाराष्‍ट्र और गुजरात जैसे विभिन्‍न राज्‍यों में इंफ्लूएंज़ा ने महामारी का रूप ले लिया था। तो हर साल अपना फ्लू शॉट लगवाएं और खुद को सुरक्षित रखें।
 
आगे क्‍या करें : अपनी वैक्‍सीन चेकलिस्‍ट रखें।
 
मिथकों को तोड़ने वाली और गहन जानकारी के लिये अपने डॉक्‍टर से बात करें, ताकि आप टीकाकरण की एक समय-सारणी बना सकें और अपने स्‍वास्‍थ्‍य का ध्‍यान रख सकें!

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