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काली खाँसी फेफड़ों का अत्यंत संक्रामक बैक्टीरियल संक्रमण है, जिसे कुकर खांसी के नाम से भी जाना जाता है। काली खांसी को अनियंत्रित एवं हिंसक खांसी के रूप में भी जाना जाता है, जो कि प्राय: सांस लेना कठिन बना देती है। खांसी के दौरे के बाद, काली खांसी से पीड़ित व्यक्ति को गहरी सांस लेने की ज़रूरत होती है, जिसके परिणामस्वरुप खांसी की आवाज़ उत्पन्न होती है।
काली खांसी (Whooping cough) नवजात शिशुओं एवं छोटे बच्चों को सामान्यत: प्रभावित करता है। यह विशेषकर एक वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों में घातक हो सकती है।
काली खांसी के लक्षण - Symptoms of whooping cough
काली खांसी के पारंपरिक लक्षण निम्न प्रकार से है:
1. आक्रमक खांसी/लगातार खांसना।
2. साँस अंदर खीचते हुए खांसी।
3. खाँसी के बाद उल्टी।
काली खांसी के अन्य लक्षणों में निम्न शामिल हैं:
काली खांसी का कारण - Cause of whooping cough
काली खांसी का कारण बोर्डेटेल्ला परट्यूसिया (Bordetella pertusia) कहलाने वाला जीवाणु है। बैक्टीरियम वायुमार्ग के अस्तर मुख्यत: श्वासनली (trachea) और दो वायुमार्ग को प्रभावित करता है, जो कि आगे जाकर फेफड़े (bronchi) में बंट जाते हैं। काली खांसी के लक्षण बोर्डेटेला पेरटूसिस जीवाणु के संक्रमण से पीड़ित होने के बाद सामान्यत: छह से बारह दिनों के बीच उपस्थित हो जाते है। इस विलंब को ऊष्मायन अवधि (incubation period) के रूप में जाना जाता है।
काली खांसी का निदान - Diagnosis of whooping cough
1. प्रयोगशाला निदान (Laboratory Diagnosis): इसमें बोर्डेट-गेनगौ मीडियम पर नासॉफिरिंजल स्वाब (nasopharyngeal swab) का कल्चर शामिल है।
2. पोलीमरेज़ चेन रिएक्शन (Polymerase Chain Reaction): पोलीमरेज़ चेन रिएक्शन (PCR) विशेष डीएनए के क्रम में हज़ार से लाखों प्रतियां उत्पन्न करने, बढ़ोत्तरी के क्रम में डीएनए के टुकड़े (DNA fragments) की कुछ प्रतियां या एकल को बढ़ाने के लिए बायोकमिकल टेक्नोलोजी (biochemical technology) मॉलिक्यूलर बायोलॉज़ी है।
3. सिरियोलोज़िकल पद्यति (Seriological method): बैक्टीरिया (bacteria) को केवल रोग के पहले तीन हफ्तों के दौरान रोगी से प्राप्त जा सकता है, इस अवधि के बाद कल्चर एवं प्रत्यक्ष फ्लोरोसेंट एंटीबॉडी (direct fluorescent antibody) परीक्षण नहीं किया जाता है, हालांकि पीसीआर में अतिरिक्त तीन सप्ताह तक कुछ सीमित उपयोगिता हो सकती है।







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