











































इन्सुलिन इंजेक्शन का प्रतीकात्मक चित्र
नयी दिल्ली। डायबिटीज के मरीजों के लिए एक अच्छी खबर ऑस्ट्रेलिया से आई है। अब डायबिटीज के मरीजों को बार-बार इंसुलिन का इंजेक्शन नहीं लेना पड़ेगा और यह फार्मूला टाइप-1 तथा टाइप-2 दोनों में कारगर साबित होगा।
मोनाश यूनिवर्सिटी, ऑस्ट्रेलिया (Monash University, Australia) के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा प्रोसेस तैयार किया है जिससे शरीर में ही इंसुलिन दोबारा बनने लगता है (insulin produced again in the body itself)। इससे डायबिटीज के मरीजों (diabetic patients) को बार-बार इंसुलिन का इंजेक्शन (frequently insulin injection) लेने का झंझट नहीं रहेगा। यह प्रोसेस पैंक्रियाटिक स्टेम कोशिकाओं (pancreatic stem cells) के जरिये काम करेगा।

मोनाश यूनिवर्सिटी, ऑस्ट्रेलिया के डायबिटीज विशेषज्ञ (diabetes experts) प्रोफेसर सैम अल-ओस्ता और डॉ इशांत खुराना ने कहा कि इस तरीके से टाइप-1 डायबिटीज (type 1 diabetes) के कारण नष्ट हो गईं कोशिकाओं की जगह नई कोशिकाएं ले लेंगी जो इंसुलिन (insulin) का उत्पादन कर सकेंगी। हलांकि अभी इस दिशा में और शोध की जरूरत है लेकिन कामयाब होने पर इसका इलाज डायबिटीज को ठीक करने में हो सकता है।
डायबिटीज विशेषज्ञ (Diabetes specialist) प्रोफेसर सैम अल-ओस्ता ने कहा कि हम पैंक्रियाज (pancreas) स्टेम कोशिकाओं को दोबारा सक्रिय करने और ‘इंसुलिन एक्सप्रेसिंग’ बनाने में कामयाब रहे हैं। हमने टाइप -1 डायबिटीज के मरीज की दान की गईं पैंक्रियाज कोशिकाओं पर अध्ययन किया है। माना जाता है कि एक बार खराब हो जाने के बाद पैंक्रियाज को ठीक नहीं किया जा सकता। इसलिए इस प्रक्रिया (Diabetes treatment) के जरिये इलाज में सफलता मिल सकती है।
प्रोफेसर सैम अल-ओस्ता ने कहा कि जब तक किसी व्यक्ति में टाइप वन डायबिटीज (T1D) का पता चलता है, तब तक इंसुलिन बनाने वाले उसकी बहुत सारी पैंक्रियाज बीटा कोशिकाएं नष्ट हो चुकी होती हैं। डायबिटीज ग्रस्त पैंक्रियाज (Diabetic pancreas) इंसुलिन नहीं बना पाता और मरीजों को रोज इंसुलिन का इंजेक्शन लेने पर निर्भर होना पड़ता है। इसका एकमात्र उपचार पैंक्रियाटिक आइलेट ट्रांसप्लांट (pancreatic islet transplant) होता है लेकिन यह अंगदान मिलने पर ही किया जा सकता है। इसलिए इस प्रक्रिया के जरिये इलाज में सफलता मिल सकती है।







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