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लखनऊ। अपोलोमेडिक्स सुपरस्पेशियल्टी अस्पताल ने हेमाटोलॉजी फाउंडेशन के साथ मिलकर “पीडियाट्रिक हेमाटोलॉजी एंड ऑन्कोलॉजी अपडेट 2023” संगोष्ठी का आयोजन किया। इसमें बाल रक्त विकार एवं कैंसर विज्ञान (पीडियाट्रिक हेमाटोलॉजी एंड ऑन्कोलॉजी) के क्षेत्र में विशेषज्ञता रखने वाले शीर्ष चिकित्सकों ने विभिन्न केस स्टडी, तकनीक और इलाज पद्धति पर आधारित प्रेजेंटेशन दिए।
संगोष्ठी में अपोलोमेडिक्स सुपरस्पेशियल्टी अस्पताल के प्रबंध निदेशक एमडी एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी सीईओ डॉ. मयंक सोमानी ने कहा कि हम अनुभवी स्वास्थ्य पेशेवरों के ऐसे प्रतिष्ठित समूह को एक साथ लाने और सभी को अपने-अपने क्षेत्र में कुछ नया सीखने और आगे बढ़ने का सुलभ मंच उपलब्ध कराने को लेकर उत्साहित हैं। पीडियाट्रिक हेमाटोलॉजी और ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में सर्वोत्तम वैश्विक प्रथाओं पर चर्चा करना और उन्हें अपनाना आवश्यक है, क्योंकि इससे इलाज को ज्यादा प्रभावी बनाने और मरीज की हालत में सुधार लाने में मदद मिल सकती है। हम इस संगोष्ठी में शामिल होने वाले सभी संकायों और प्रतिनिधियों के आभारी हैं।
उन्होंने कहा कि हम हेमाटोलॉजी फाउंडेशन को भी धन्यवाद देना चाहता हूं, जो पीडियाट्रिक हेमाटोलॉजी और ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में असाधारण काम कर रहा है। मुझे उम्मीद है कि यह संगोष्ठी रक्त विकार और कैंसर से जूझ रहे बच्चों की देखभाल और उपचार सुविधा में सुधार लाने में मददगार साबित होगी।
संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान की निदेशक प्रोफेसर डॉ. सोनिया नित्यानंद ने कहा कि अमेरिका में जहां प्राइमरी इम्युनोडेफिशिएंसी डिसऑर्डर पीआईडी के मामले काफी अधिक (हर 1,200 में से एक) हैं, वहीं भारत में पीआईडी के मरीजों को लेकर फिलहाल कोई राष्ट्रव्यापी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। हालांकि सांख्यिकीय अनुमानों के आधार पर देश में पीआईडी के दस लाख से अधिक मरीज होने की आशंका है। मुझे उम्मीद है कि संगोष्ठी में उपस्थित लोग इस आयोजन के माध्यम से बहुमूल्य ज्ञान और अंतर्दृष्टि प्राप्त करने में सफल हुए हैं।
अपोलो हॉस्पिटल लखनऊ में पीडियाट्रिक हेमाटोलॉजी और ऑन्कोलॉजी की विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. अर्चना कुमार ने कहा कि पीआईडी के लगभग 60 से 70 फीसदी मामलों में मरीज की जान बचाने के लिए अस्थि मज्जा प्रतिरोपण बोन मैरो ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है। हालांकि, डोनर की कमी के चलते प्रतिरोपण में काफी समय लगता है। अस्थि मज्जा प्रतिरोपण के मामलों में आमतौर पर मरीज के भाई-बहन या फिर बाहरी व्यक्ति डोनर होते हैं। उन्होंने कहा कई बार माता-पिता लंबी उपचार प्रक्रिया, लागत और अन्य कारकों के चलते इलाज के लिए आगे नहीं आते। पीआईडी के सभी मामले जानलेवा नहीं होते, लेकिन इलाज न करने पर ये कैंसर का रूप अख्तियार कर सकते हैं।
संगोष्ठी में देश के शीर्ष संस्थानों से जुड़े उच्च विशेषज्ञता वाले कई अनुभवी वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए जिनमें प्रोफेसर डॉ. अमिता अग्रवाल प्रोफेसर एवं प्रमुख, इम्यूनोलॉजी, एसजीपीजीआईएमएस, लखनऊ, प्रोफेसर डॉ. अर्चना कुमार विभागाध्यक्ष, पीडियाट्रिक हेमाटोलॉजी और ऑन्कोलॉजी, अपोलो अस्पताल, लखनऊ, डॉ. एसपी यादव, डॉ. विकास दुआ और डॉ. निशांत वर्मा केजीएमयू लखनऊ, डॉ. स्नेहा टंडन (रॉयल लंदन हॉस्पिटस, बीएआरटीएस हेल्थ, एनएचएस ट्रस्ट, लंदन), डॉ. प्रियंका चौहान और डॉ. विजय पी रतूड़ी अपोलो अस्पताल लखनऊ, डॉ. सुकृति गुप्ता और डॉ. शिल्पी अग्रवाल आरएमएलआईएमएस लखनऊ, डॉ. निवेदिता पी येरामिल्ली और डॉ. आशी गुप्ता एसजीपीजीआईएमएस लखनऊ शामिल हैं। अपोलो अस्पताल लखनऊ में कंसल्टेंट हेमाटोलॉजी और बोन मैरो ट्रांसप्लांट डॉ. प्रियंका चौहान ने हेमाटोलॉजिकल मैलिग्नेंसी (रक्त का निर्माण करने वाले ऊतकों में शुरू होने वाला कैंसर) में सहायक देखभाल और बाल रोग विशेषज्ञों की भूमिका पर एक प्रेजेंटेशन दिया। उन्होंने भारत में प्राथमिक इम्यूनोडिफीसिअन्सी डिसऑर्डर (पीआईडी) के उच्च प्रसार पर भी प्रकाश डाला।
संगोष्ठी में एचएलएच, पीआईडी, ल्यूकेमिया, लिम्फोमा, पीडियाट्रिक एएएल एंड एएमएल सहित विभिन्न बाल रोगों के निदान और उपचार में हालिया विकास पर आधारित विषयों की एक विस्तृत शृंखला शामिल थी। इस कार्यक्रम ने उपस्थित सदस्यों को पीडियाट्रिक हेमाटोलॉजी और ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में नवीनतम विकास के बारे में जानने का अवसर मुहैया किया।







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