












































महायोगी गोरक्षनाथ विश्वविद्यालय के कुलपति सेवानिवृत मेजर जनरल डा. अतुल वाजपेयी
गोरखपुर। महायोगी गोरक्षनाथ विश्वविद्यालय, गोरखपुर के कुलपति रिटायर्ड जनरल डा. अतुल वाजपेयी ने कहा है कि एलोपैथ और आयुर्वेद को एक-दूसरे का पूरक बनने की दिशा में काम करना चाहिए
healthjagaran.com के साथ शुक्रवार को प्रशासनिक भवन के अपने चेंबर में एक खास बातचीत में डा. वाजपेयी ने कहा कि 5000 साल से भी ज्यादी पुरानी पैथी पर शोध न होना दुर्भाग्य का विषय है। यह संतोष की बात है कि प्रधानमंत्री की चाहत के बाद आयुर्वेद पर काम शुरू हुआ। पहली बार आयुष मंत्रालय की स्थापना हुई। शोध कार्य चालू किये गए गए हैं। अब आयुर्वेद उठ कर बैठ गया है।
यह पूछे जाने पर कि BAMS कोर्स की डिजाइन पर एलोपैथ वाले तीखा हमला कर रहे हैं, डा. वाजपेयी ने कहा कि हमला करने की जरूरत नहीं है। आयुर्वेद की चंद कमियों को एलोपैथ दूर करे, एलोपैथ की चंद कमियों को आयुर्वेद दूर करे। मकसद तो दोनों पैथी का यह होना चाहिए कि इंसान का कल्याण हो।
एक अन्य सवाल के जवाब में डा. वाजपेयी ने कहा कि एलोपैथ के अपने फायदे-नुकसान हैं। आयुर्वेद के अपने फायदे-नुकसान हैं। जिस इंटीग्रेटेड कोर्स पर हम लोग काम कर रहे हैं, वह लोगों की भलाई के लिए ही है। जहां एलोपैथ की जरूरत होगी, वहां एलोपैथ की मदद ली जाएगी। एलोपैथ वालों को जहां जरूरत होगी, वे आयुर्वेद की मदद लेंगी। दोनों पैथियों के सम्मिश्रण से लोगों का फायदा ही होगा।
गोरखपुर में आयुवेर्दिक दवाईंयां बनाने वाली कंपनी बैद्यनाथ आयुर्वेद के साथ हाल ही में हुए एमओयू दस्तखत पर डा. बाजपेयी ने कहा कि यह मुख्यमंत्री की सोच का परिणाम है। आप देखेंगे कि बहुत जल्द यहां के लोगों को रोजगार मिलने लगेगा। जो लोग आयुर्वेद की डिग्री लेकर खाली बैठे हैं, उनके लिए धनोपार्जन का बहुत बड़ा माध्यम बनेगा यह मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट। इतना ही नहीं, जो किसान हैं, जो हर्बल खेती करते हैं, जो हल्दी आदि की खेती करते हैं, उन्हें भी बढ़िया मुनाफा मिलेगा।
एक सवाल के जवाब में डा. वाजपेयी ने बताया कि हम छात्रों को सिर्फ बीएएमएस की डिग्री ही नहीं दिला रहे हैं। हम उनके भीतर एन्टरपेन्योरशिप के गुण भी विकसित करना चाहते हैं ताकि जब वो पढ़ कर निकलें तो उनके सामने अवसरों की कोई कमी न हो। चूंकि आयुर्वेद एक लाइफ साइंस है, लिहाजा हम लोगों की कोशिश है कि बच्चे क्षण भर के लिए भी बेरोजगारी का सामना न करें।
यह पूछे जाने पर कि आय़ुर्वेद पर लोगों को सहसा यकीन क्यों नहीं होता, उन्होंने कहा कि देखिए, जो हमारी-आपकी सभ्यता-संस्कृति है, उसे विदेशी आक्रमणकारियों ने हर तरीके से क्षत-विक्षत करने की हर मुमकिन कोशिश की। आय़ुर्वेद हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा था। एलोपैथ हमारे जीवन का कभी हिस्सा नहीं था। तो, एक साजिश के तहत एलोपैथ को पूरी दुनिया में प्रचलित किया गया, आय़ुर्वेद पीछे चला गया।
उन्होंने कहा कि जो भी शोध हुए, एलोपैथ पर हुए। नरेंद्र मोदी सरकार के पहले आय़ुर्वेद पर चर्चा करने की जहमत भी कोई नहीं उठाता था। सैकड़ों साल से जिस चीज से आपको दूर रखा जाए, वह आपकी स्मृति पटल से स्वाभाविक रूप से ओझल हो जाती है। फिर, आप उस पर सहसा यकीन नहीं करते। अब आय़ुर्वेद पर बात होने लगी है। काम होने लगा है। आय़ुष विश्वविद्यालय बन रहे हैं। गोरखपुर में कितना बड़ा काम हुआ है। देश के अनेक हिस्सों में इस तरह के काम हो रहे हैं। तो आने वाले दिनों में आयुर्वेद के दिन भी बहुरेंगे। यह सही है कि आयुर्वेद इंस्टैंट रिलीफ में थोड़ी पीछे है पर इसके अन्य इस्तेमाल बीमारी को जड़ से उखाड़ कर फेंक देते हैं।







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