











































लखनऊ। वर्तमान की लाइफ स्टाइल का पूरा दबाव आंखों पर रहता है। आज कल बच्चों से लेकर बूढ़ों तक मोबाइल, टीवी, लैपटॉप या कम्प्यूटर की गिरफ्त में हैं। स्क्रीन टाइम बढ़ जाने से हमारी आंखों पर क्या असर हो रहा है? आंखों में परेशानियां आने पर क्या लक्षण होते हैं? और सबसे महत्वपूर्ण बात कि इन सबसे कैसे बचा जा सकता है। इन्ही बेहद जरूरी सवालों के जवाब लेने के लिए हेल्थ जागरण ने सुशांत गोल्ड सिटी में, केवीजी मिलेनियम प्लेस स्थित आईलिश विज़न सेंटर की संस्थापक कंसल्टेंट ऑप्टोमेट्रिस्ट (D.OPT) सरिता सिंह से खास बातचीत की।
हेल्थ जागरण - स्क्रीन टाइम (screen time) बढ़ने से आंखों पर क्या असर हो रहा है?
सरिता सिंह - आज की दुनिया पूरी तरह से डिजिटल हो चुकी है। हम जितनी देर स्क्रीन के सामने रहते हैं आँखें (Eye) ड्राईनेस (dryness) का शिकार रहती है। बार बार स्क्रीन के सामने जाने से यह समस्या बढ़ती रहती है और समय से जांच ना करवाने पर आंखें खराब होने लगती है।
हेल्थ जागरण - यदि कार्निया (cornea) डैमेज होने लगे तो क्या उपाय करने चाहिए?
सरिता सिंह - अगर आंखों में कोई भी दिक्कत है तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं। इसमें देर नहीं करनी चाहिए क्योंकि लेट करने से कार्निया खराब होने लगती है।
हेल्थ जागरण - क्या कार्निया ट्रांसप्लांट (cornea transplant) होता है? यदि हां तो सफलता कितने प्रतिशत तक होती है?
सरिता सिंह - कार्निया ट्रांसप्लांट होता है। यह अंतिम उपाय होता है। यदि पुतली पूरी तरह सफ़ेद है और दवा का असर नहीं हो रहा तब कार्निया ट्रांसप्लांट किया जाता है। यह लगभग सफल रहता है और यह कार्निया की स्थिति पर निर्भर करता है। कार्निया दान करने के लिए जागरुकता की आवश्यकता है। लोगों में मिथ्या धारणा है कि मैं जीते जी कार्निया कैसे दान करूं! ्र्््र्
ट्रांसप्लांट के लिए ज्यादातर बूढ़ी कार्निया मिलती है। तो कार्निया ट्रांसप्लांट की सफलता कार्निया की उम्र पर भी निर्भर करती है। अगर हेल्दी कार्निया मिलेगी तो सफलता की दर ज्यादा होगी।
हेल्थ जागरण - टीवी, लैपटॉप, मोबाइल और कम्प्यूटर के युग में आंखों को कैसे बचा कर रखा जाएं ?
सरिता सिंह - ये सबसे अच्छा और महत्वपूर्ण सवाल है। आज कल लोग इसी समस्या से जूझ रहे हैं। इसे डिजिटल आई सिंड्रोम (digital eye syndrome) भी कहते हैं। इसमें आंखों में थोड़ी लाली बने रहना, सूखापन रहना, आंखों में थकान होना और कंधों में दर्द होना जैसे लक्षण होते हैं।
डिजिटल आई सिंड्रोम से बचने के लिए सुबह जल्दी उठना बहुत जरुरी है। सूरज की पहली किरणें आंखों के लिए वरदान है। लेट नाइट सोना, सुबह देर से उठने से विटामिन डी की कमी होने लगती है। प्रापर विटामिन डी ना मिलने से क्रेटोकोनस बनता है यह रिसर्च में पाया गया है। तो आंखों के लिए विटामिन डी बहुत जरूरी है। इसके लिए सुबह जल्दी उठें।







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