












































प्रतीकात्मक चित्र
दिनचर्या एक संस्कृत शब्द है। जिसका अर्थ दैनिक कार्यकम हैं। दिन का अर्थ है; दिन का समय और चर्या का अर्थ है उसका पालन करना। दिनचर्या, आदर्श दैनिक कार्यक्रम है। यह प्रकृति के चक्र के साथ साथ मनुष्यों के सम्पूर्ण जीवन काल को प्रभावित करती है। दिनचर्या का आधार प्रातः काल पर केंद्रित होता है क्योंकि वह पूरे दिन को नियमित करने में महत्वपूर्ण है।
आयुर्वेद यह मानता है कि दिनचर्या शरीर और मन का अनुशासन है। दिनचर्या के नियमित रूप से पालन करने पर प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत होता है और शरीर के दूषित पदार्थो से शरीर शुद्ध होता है। सरल स्वस्थ दिनचर्या से शरीर और मन शुद्ध होते हैं, दोष संतुलित होते हैं, प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत होता है और मनुष्य निरोगी जीवन पाता है। आइये भारतीय परंपरा के अनुसार दैनिक दिनचर्या को समझतें हैं।
ब्रह्म मुुहुुर्त मेेंं उठें - Get up in Brahma Muhurta
सूर्योदय से पूर्व उठना चाहिए क्योंकि उस समय वातावरण प्रदूषण रहित रहता है। प्राणवायु (आक्सीजन) की मात्रा सर्वाधिक रहती है। सुबह वातावरण के प्रभाव से अपने शरीर में उपयोगी रसायन स्रवित होते है जिनसे ऊर्जा एवं उत्साह का संचार होता है।
सुबह उठकर पानी पीएं - Wake up in the morning and drink water
सुबह उठकर पानी पीने से शरीर से शरीर के विषैले पदार्थ बाहर निकलते हैं। पाचन तन्त्र नियमित रहता है। समय से पूर्व बालों का सफेद होना एवं झुर्रियों का आना रुकता है।
ध्यान करें - Meditate
मन एकाग्रचित्त होता है जिससे मानसिक एवं शारीरिक तनाव दूर होता है। तनाव से होने वाली शारीरिक एवं मानसिक व्याधियां नहीं होती। ध्यान के लिए ईश इष्ट का ध्याय करना चाहिए।
मल-मूत्र उत्सर्जन - go to toilet
शरीर में उपापचय के फलस्वरूप बने अवशिष्ट एवं विषैले तत्वों को उत्सर्जन क्रिया द्वारा बाहर निकाला जाता है। प्रातः काल इस क्रिया को करने से पूरे दिन शरीर में लघुता (हल्कापन) रहता है। इस क्रिया के पश्चात् हाथ-पैर भली प्रकार साफ करने चाहिए जिससे संक्रमण का भय नहीं रहता।
दांत और जीभ साफ़ करें - Clean teeth and tongue
प्रातः काल दांत, जीभ और मुँह साफ़ करना चाहिए। इससे दांत स्वच्छ एवं मजबूत होते हैं। मुंह की दुर्गन्ध एवं विरसता का नाश होता है। जिह्वा स्वच्छ एवं मलरहित रहती है जिससे स्वाद का ज्ञान भलीं प्रकार होता है।
मुँह धोइये - Wash your face
लोध्र और आंवला आदि को उबाल कर उस पानी से मुँह और आंखें धोनी चाहिए। इससे मुख की स्निग्धता दूर होती है। मुहांसे, झाइयां नहीं होते, चेहरा कांतिमय बनता है। नेत्र- ज्योति बढ़ती है।
आँखों में अंजन लगायें - Put ajjan in the eyes
आंखें साफ-स्वच्छ होता हैं नेत्र-ज्योति बढ़ती है। आंखों के रोग नहीं होते। नेत्र सुन्दर एवं आकर्षक होते हैं।
नाक में तेल डालें - Put oil in the nose
रोज सुबह 2-3 बूंद गरम करके ठण्डा किया हुआ सरसों या तिल का तेल नाकों में डालना चाहिए। नाक में तेल डालने से सिर, आंख, नाक के रोग नहीं होते। नेत्र-ज्योति बढ़ती है। बाल काले-लम्बे होते हैं। समय से पूर्व न झड़ते एवं न सफेद होते है।
शरीर पर तेल मालिश करें - Massage oil on body
स्नान के पहले शरीर पर तेल मालिश करनी चाहिए। उससे त्वचा कोमल, कांतियुक्त, रागरहित रहती है। त्वचा में रक्त संचार बढ़ता है। विषैले तत्व शरीर से बाहर निकलते है तथा त्वचा में झुर्रियां नहीं पड़ती।
व्यायाम करें - Exercise
सूर्य नमस्कार, एरोबिक्स, योग या दैनिक व्यायाम से शारीरिक सामर्थ्य और रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। शरीर के समस्त स्रोतस की शुद्धि होती है, रक्त संचार बढ़ता है, अवशिष्ठ पदार्थों को शरीर से बाहर निकालता है। अतिरिक्त चर्बी घटती है।
क्षौरकर्म करें - Mend physical appearance
समय पर दाढ़ी-मूंछ बनवाने, बाल कटवाने, नाखून कटवाने से त्वचा स्वच्छ रहती है, प्रसन्नता आती है। शरीर में लघुता आती है तथा ऊर्जा का संचार होता है। नाखून के द्वारा होने वाले संक्रमण का भय कम होता है।
उबटन लगाएं - Apply Home Made Paste on Body
सुगन्धित पदार्थों के लेप या उबटन करने से शरीर की दुर्गन्ध दूर होती है। मन में प्रसन्नता और स्फूर्ति आती है। उबटल से शरीर की अतिरिक्त वसा नष्ट होती है। शरीर के अंग स्थिर एवं दृढ़ होते है। त्वचा मुलायम एवं चमकदार होती है। त्वचा के रोग मुहांसे, झांईयां आदि नहीं होते।
स्नान करें - Bathe daily
स्नान दैनिक स्वास्थ्य के लिए अत्यावश्यक है। स्नान से शरीर की सभी प्रकार की अशुद्धियां दूर होती है। इससे गहरी नींद आती है। शरीर से अतिरिक्त ऊष्मा, दुर्गन्ध, पसीना, खुजली , प्यास को दूर करता है। शरीर की समस्त ज्ञानेन्द्रियों को सक्रिय करता है। रक्त का शोधन होता हैं, भूख बढ़ती है।
निर्मल वस्त्र धारण करें - Wear clean clothes
स्वच्छ एवं आरामदायक कपड़े पहनने से सुन्दरता, प्रसन्नता, आत्मविश्वास की वृद्धि होती है।
धूप, धूल आदि से बचाव करें - Protect from sun, dust etc.
सीधी सूर्य की किरणों से जितना हो सके बचना चाहिए। त्वचा के सीधे सूर्य की किरणों के अधिक सम्पर्क में आने से त्वचा में विभिन्न विकार हो जाते हैं। छाता, स्कार्फ या सनस्क्रीन लोशन का उपयोग हितकर है।
समय से सोएं - sleep on time
ग्रीष्म ऋतु के अतिरिक्त सभी ऋतुओं में रात्रि में 6-8 घन्टे की नींद आवश्यक है। उचित निद्रा के सेवन से शारीररिक एवं मानसिक थकान दूर होती है। सम्यक पाचन होता है। शरीर में नई ऊर्जा का संचार होता है। निद्रा शरीर की सम्यक वृद्धि एवं विकास के लिए आवश्यक है।







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