












































प्रतीकात्मक चित्र
नयी दिल्ली। आंकड़े बतातें हैं कि वर्ष 2019 में भारत में 7.7 करोड़ लोग डाइबिटीज से पीड़ित थें। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक यह संख्या बढ़कर 7.95 करोड़ हो जाएगी। अक्सर डाइबिटीज की दवा एक बार शुरू हुई तो जीवन पर्यन्त चलती है। इससे मरीज़ के जेब पर भारी बोझ पड़ता है। हिमाचल प्रदेश की आईआईटी मंडी, मरीज़ों को इस समस्या से निजात दिलाने जा रही है। आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ बेसिक साइंस के वैज्ञानिकों ने एक शोध में पीके टू नामक मॉलिक्यूल पहचान की है। यह पैंक्रियाज से इंसुलिन का स्राव शुरू करने में सक्षम है। इससे डायबिटीज के इलाज के लिए सस्ती दवा बनाई जा सकेगी।
इस शोध के आधार पर बनने वाली दवा बाज़ार में आने के बाद देशभर में टाइप-1 और टाइप-2 डाइबिटीज से जूझ रहे रोगियों को महंगे इंसुलिन टीके पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। सस्ती गोली भी बाजार में आने वाली है।

शोधपत्र को पूरा करने में आईसीएमआर-आईएएसआरआई (ICMR-IASRI) दिल्ली के वैज्ञानिकों ने अहम भूमिका निभाई है। प्रमुख शोधकर्ता डॉ. प्रोसेनजीत मंडल के अनुसार उनकी टीम ने डायबिटीज के इलाज (treatment of diabetes) में कारगर एक नया शोध के निष्कर्ष जर्नल ऑफ बायोलॉजिकल केमिस्ट्री (Journal of Biological Chemistry) में प्रकाशित किए गए हैं। शोध के सह लेखक आईआईटी मंडी (IIT Mandi) के प्रो. सुब्रत घोष और डॉ. सुनील कुमार हैं। नई दिल्ली पूसा स्थित आईसीएआर-आईएएसआरआई के वैज्ञानिकों डॉ. बुधेश्वर देहुरी, डॉ. ख्याति गिरधर, डॉ. शिल्पा ठाकुर, डॉ. अभिनव चौबे, डॉ. पंकज गौर, सुरभि डोगरा, बिदिशा बिस्वास और क्षेत्रीय आयुर्वेदिक अनुसंधान संस्थान (आरएआरआई) ग्वालियर के डॉ. दुर्गेश कुमार द्विवेदी के सहयोग से यह शोध किया गया है।
आईआईटी मंडी के निदेशक लक्ष्मीधर बैहरा ने बताया कि टाइप-1 और टाइप-2 डाइबिटीज (type-1 and type-2 diabetes) के रोगियों को डायबिटीज के इलाज के लिए वर्तमान में एक्सैनाटाइड और लिराग्लूटाइड जैसी दवाओं की सुई दी जाती है। यह महंगी और अस्थिर होती है। हमारा लक्ष्य सरल दवाइयां ढूंढना है। गोली तैयार करने के लिए यह शोध डाइबिटीज के रोगियों के उपचार के लिए स्थिर, सस्ता और असरदार होगा।
प्रमुख शोधकर्ता ने बताया कि पीके टू (PK-2) नामक मॉलिक्यूल पहचान करने के बाद इसके जैविक प्रभावों का असर चूहों में ढूंढा गया। दो साल तक इस पर गहन अध्ययन हुआ। दवा देने के बाद शोधकर्ताओं ने देखा कि पीके 2 गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट में तेजी से अवशोषित हो गया। इसका अर्थ यह है कि इससे तैयार दवा की सुई के बदले खाने की गोली इस्तेमाल की जा सकती है। दवा देने के दो घंटे के बाद पाया गया पीके 2 चूहों के लिवर, किडनी और पैंक्रियाज में पहुंच गया। इसका कोई अंश हृदय, फेफड़े और स्प्लीन में नहीं था। बहुत कम मात्रा में यह मस्तिष्क में मौजूद पाया गया। इससे पता चलता है कि यह मॉलिक्यूल रक्त-मस्तिष्क बाधा पार करने में सक्षम हो सकता है। लगभग 10 घंटे में यह रक्तसंचार से बाहर निकल गया।







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