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अल्कोहल की भाप से कोरोना के इलाज पर शोध।

अमेरिका में अल्कोहल की भाप को अंदर लेकर कोरोना के इलाज पर प्रयोग किए जा रहे हैं।अब तक के परीक्षण से पता चला है कि रोगी मिनटों में सांस लेने में बहुत सहज हुए है।

हे.जा.स.
July 06 2021 Updated: July 06 2021 22:57
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अल्कोहल की भाप से कोरोना के इलाज पर शोध। प्रतीकात्मक

नई दिल्ली। कोरोना वायरस पर काबू पाने के लिए तरह-तरह के इलाज का दावा किया गया है, लेकिन अभी तक वैज्ञानिक प्रभावी इलाज की तलाश में हैं। एक प्रयोग अभी अमेरिका में हो रहा है, जिसमें शराब सूंघकर कोविड-19 से निजात दिलाने का प्रयास किया जा रहा है।

अमेरिका में अल्कोहल की भाप को अंदर लेकर कोरोना के प्रभावी इलाज पर वैज्ञानिक प्रयोग किए जा रहे हैं। अब तक तीन चरणों के प्रयोग के नतीजे सामने आ चुके हैं। जिससे वैज्ञानिक भी काफी उत्साहित हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि अब तक के परीक्षण से पता चला है कि रोगी मिनटों में सांस लेने में बहुत सहज है।

पहली बार अल्कोहल वाष्प को सूंघने और फेफड़ों के संक्रमण में सफलता का प्रयोग देखा गया है। इसके परिणामों को देखकर वैज्ञानिक का कहना है कि यदि इस तकनीक के सार्वजनिक उपयोग की अनुमति दी जाती है, तो एक सच्ची चिकित्सा क्रांति होगी।

निष्कर्ष संयुक्त राज्य अमेरिका में फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) सेंटर फॉर ड्रग इवैल्यूएशन एंड रिसर्च पर आधारित हैं।

डेल्टा वेरिएंट के खिलाफ कितनी कारगर होगी कोरोना की वैक्सीन?

इंटरनेशनल जर्नल फ़ार्मास्युटिकल्स में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट के अनुसार, सामान्य तापमान पर सूरज की रोशनी से दूर रखे गए 65% अल्कोहल वाले एक रसायन को 3.6 मिलीग्राम प्रति मिनट की दर से ऑक्सीजन द्वारा अंदर लिया गया था। यह इलाज कोरोना के गंभीर रूप से संक्रमित मरीजों को रोजाना 45 मिनट तक दिया जाता था। कोविड संक्रमण के मामले में टीम ने पाया कि ज्यादातर लोगों का सबसे पहले ऊपरी श्वसन तंत्र पर प्रभाव पड़ा।

शोधकर्ताओं ने पाया है कि अल्कोहल की भाप तकनीक का कोरोना वायरस के लेप पर सीधा प्रभाव पड़ता है। यह प्रोटीन की इस परत के माध्यम से ही मानव कोशिकाओं पर हमला करता है। ऑक्सीजन के साथ-साथ अल्कोहल की भाप नाक से श्वासनली और फिर फेफड़ों तक पहुंचती है।

नतीजतन, श्वासनली में और रोगियों की नाक के अंदर कोविड वायरस के कारण झिल्ली की परत में सूजन जल्द ही कम हो गई। सांस लेना आसान हो गया, फेफड़े का सेल्फ-इम्यून सिस्टम बेहतर तरीके से काम करने लगा। उसे भी राहत मिली। प्रयोग का फाइबोलाइट, न्यूट्रोफिल और साथ ही ल्यूकोसाइट्स पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा।

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