












































प्रतीकात्मक चित्र
गोरखपुर। प्रदेश बीते कुछ वर्षों से एक नए प्रकार के घातक बुखार का असर देखने को मिल रहा है। इसे लेकर महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय और इससे संबद्ध चिकिसालय द्वारा रीजनल मेडिकल रिसर्च सेंटर (आरएमआरसी) के सहयोग से रिसर्च किया गया है। रिसर्च के परिणाम चौंकाने वाले हैं। यह घातक बुखार लेप्टोस्पायरोसिस नामक बीमारी है। जिसके मुख्य वाहक चूहे हैं।
बुखार के नए स्वरूप पर महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय (Mahayogi Gorakhnath University) द्वारा केस स्टडी किया गया। इसको पर शुक्रवार को विभिन्न संस्थाओं के विशेषज्ञोंने मंथन किया। केस स्टडी का प्रेजेंटेशन देते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति मेजर जनरल डॉ अतुल वाजपेयी ने बताया कि अस्पताल में भर्ती मरीजों पर पांच प्रकार की बीमारियों स्क्रब टायफस (Scrub Typhus), लेप्टोस्पायरोसिस (Leptospirosis), डेंगू (Dengue), चिकनगुनिया (Chikungunya) व एंटरोवायरस (Enterovirus) पर जांच शुरू की गई। 20 जून से 6 अगस्त तक कुल 88 रक्त नमूनों की जांच के बाद गहन विश्लेषण किया गया। इनमें से 50 फीसद यानी 44 नमूने लेप्टोस्पायरोसिस पॉजिटिव पाए गए। जबकि 1 नमूने में स्क्रब टायफस, 9 में डेंगू आईजीएम, 3 में चिकनगुनिया व 3 में एंटरोवायरस पॉजिटिव होने का पता चला।
कुलपति डॉ वाजपेयी ने बताया कि विश्लेषण में पाया गया कि लेप्टोस्पायरोसिस बीमारी 20 से 60 वर्ष के उम्र के लोगों में हो रही है। इससे बिना ठंड के उच्च तापमान का बुखार (fever) हो रहा है। मरीज के पूरे शरीर में दर्द रहता है। चौथे-पांचवे दिन कुछ मरीजों में हल्के पीलिया (mild jaundice) व कुछ में निमोनिया (pneumonia) के लक्षण मिलने लगते हैं। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि थर्ड-फोर्थ जनरेशन की एंटीबायोटिक (third-fourth generation antibiotics) दवाओं का उतना असर नहीं होता जितना सामान्य निमोनिया के मामलों में दिखता है।
डॉ वाजपेयी ने बताया कि लेप्टोस्पायरोसिस अधिकतर चूहों (rats) के शरीर में रहता है और उसके पेशाब (urine) से यह वातावरण में आता है। त्वचा के जरिये यह मनुष्य के शरीर में पहुंच उसे बीमार कर सकता है। दवाओं की उपयोगिता समझने के साथ इस बीमारी पर नियंत्रण पाने के लिए चूहों पर नियंत्रण पाना बेहद अहम होगा।







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