











































लखनऊ। हेल्थ जागरण लगातार आपको अंग प्रत्यारोपण से जुड़े सभी तथ्यों से रुबरु करवा रहा है। अंगदान से जुड़ी लगभग सभी भ्रांतियों को दूर करने के लिए विभिन्न चिकित्सा विशेषज्ञों से हमने बातचीत की है। साथ ही अंगदान के नियमों को लेकर भी जन जागरण का प्रयास किया है। इसी कड़ी में हेल्थ जागरण ने अंगदान प्रोत्साहन को लेकर मशहूर लिवर ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ (liver transplant specialist) डॉ वलीउल्ला सिद्दीकी, अपोलो अस्पताल से खास बातचीत की।
हेल्थ जागरण - डॉ साहब अंगदान को लेकर तमाम तरीके की मिथ्याएं समाज में फैली हुई है, इनको कैसे दूर किया जा सकता है?
डॉ वलीउल्ला सिद्दीकी - देखिए अंगदान (organ donation) को लेकर तमाम तरीके की भ्रांतियां समाज में हैं जिनको दूर करना बहुत जरूरी है। इसके लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं, सोशल वर्कर्स, समाज सेवी संस्थाओं, स्कूल्स और ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ना पड़ेगा। जिससे समाज को यह समझाया जा सके कि अंगदान महादान है। इसके साथ ही इस जागरूकता अभियान में मीडिया (media) का बहुत बड़ा रोल है। उन्हें भी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए काम करना पड़ेगा।
इन मिथ्याओं को दूर करने के लिए यह जानना जरूरी है कि लोगों की बॉडी इनटेक्ट रहती है। किसी भी मरीज का गलत तरीके से अंग प्रत्यारोपण (organ transplant) नहीं हो सकता है। ये इसलिए भी सम्भव नहीं है क्योंकि अंगदान के लिए स्टेट और नेशनल कमेटियां होती है। बहुत सारे प्रोसीजर्स होते हैं। तो किसी एक के हाथ में नहीं होता है। डॉक्टर्स या ट्रांसप्लांट सर्जरी (transplant surgery) टीम किसी भी तरह से मरीजों या परिजनों के डायरेक्ट टच में नहीं रहती है। ट्रांसप्लांट सर्जन अंतिम समय तक नहीं जानते कि किसका अंग प्रत्यारोपण करने वाले हैं। ट्रांसप्लांट सर्जन के हाथ में कभी भी ऊपर नीचे करने की शक्ति नहीं होती है। इसमें हमारी मर्जी नहीं होती कि किसका अंग प्रत्यारोपण करें और किसको नहीं करें। बकायदा लिस्ट और कमेटियां तय करती है कि किसको अंग मिलना है और इस काम पर लगातार निगरानी रखी जाती है। इसका रजिस्ट्रेशन बहुत पहले से हो जाता है। अंग प्राप्त करने वाले को भी पता नहीं होता कि किसका अंग उसको मिलने वाला है।
तो ये मिथ्या धारणाएं समाज से दूर करनी होगी और ज्यादा से ज्यादा लोगों को इससे जोड़ना पड़ेगा। दक्षिण भारत में अंगदान को लेकर बहुत जागरुकता है। बहुत सारी स्वयं सेवी संस्थाएं इस नोबल कॉज में लडी है। ट्रस्ट (Trusts), फाउण्डेशन्स (foundations), एनजीओज़ (NGOs) आदि को डेडीकेटेड हो कर काम करना पड़ेगा। जब समाज से भ्रांतियां दूर होगी तभी यह पुनीत कार्य सम्भव हो सकेगा।







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