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कोरोना में मरी इंसानियत, लाशों पर भी हुआ व्यापार। 

एक दुकानदार ने बताया कि उनकी दुकान दादा परदारा के समय की है। इस कोरोनाकाल ने मौत का जो दौर दिखाया, वह शायद इससे पहले कभी नहीं देखा गया।

हुज़ैफ़ा अबरार
May 17 2021 Updated: May 17 2021 04:38
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कोरोना में मरी इंसानियत, लाशों पर भी हुआ व्यापार।  प्रतीकात्मक

लखनऊ। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान देश और प्रदेश में महामारी चरम पर है। इस महामारी की चपेट में आकर मरने वालों की संख्या में इजाफा देखा जा रहा है। इसी कडी में अंतिम क्रिया के लिए सामान बेचने वालों ने भी खूब जमकर मौत के इस तांडव से मुनाफ़ा कमाया। जेब भरने का यह क्रम आज भी चल रहा है। 

डालीगंज पुल के पास अंतिम क्रिया का सामान बेच रहे एक दुकानदार ने बताया कि उनकी दुकान दादा परदारा के समय की है। इस कोरोनाकाल ने मौत का जो दौर दिखाया, वह शायद इससे पहले कभी नहीं देखा गया। 

उनके अनुसार उन्होंने ने एक दिन में 20 से 25 लोगों के क्रियाकर्म के लिए सामान बेचा। जबकि सामान्य दिनों में यह महज दो या तीन की संख्या ही रहती है। अप्रैल का महीना मौत के लिए बेहद खतरनाक था।

महामारी के दौरान तय है सब के रेट
अंतिम संस्कार के लिए पैकेज तक बन गए हैं। डालीगंज स्थित अंतिम क्रिया का सामान बेचने वाली दुकानों पर बैठे लोगों ने पैकेज के बारे में विस्तार से बताया। राजू नाम के एक लडके ने बताया कि नॉन कोविड शवों के अंतिम संस्कार का 20 हजार रुपये तक का पैकेज ऑफर हो रहा है। उसने यह भी कहा कि कोविड शवों का चार्ज अलग होता है।

ये हैं पैकेज
फ्रीजर का रेट 24 घंटे के लिए 4500 रुपये
 (डाला का भाडा व लाने ले जाने वाले लडकों की मजदूरी समेत)। इसके बाद 3000 रुपये प्रतिदिन।
अस्पताल से घर के लिए वाहन 1500 रुपये
वहीं, घर से शमशान घाट के लिए 2500 रुपये।

इन चीजों का ये है भाव
अंतिम संस्कार का सामान 4000 रुपये में।
(अप्रैल में यही भाव करीब 6000 थे)
बांस की अर्थी बनाने का खर्च करीब 1100 से 2000
लकड़ी और अर्थी जलाने का चार्ज 4000 रुपये। 
कंधा देकर श्मशान तक ले जाने तक का 2000 रूपये। 

यह तस्वीर लखनऊ के श्मशान की है। जहां पर अब चिताओं की संख्या में कमी आई है। कहा जा रहा है कि ये बदलाव लॉकडाउन और जागरुकता से आया है। करीब एक सप्ताह पहले तो चिताएं सुबह-सुबह ही सज जातीं थी। लेकिन बीते कुछ दिनों से स्थिति संभली नजर आ रही है और शवों के आने की रफ्तार थोडी मंद पडी है।

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