












































मंदिर की ड्योढ़ी पर श्रीमती ललिता देवी
जीवन की सबसे अहम् ज़रुरत स्वास्थ है। इसके लिए लोग अनेको-अनेक उपाय करतें हैं। वास्तव में स्वस्थ्य रहने के लिए मन, वचन और कर्म की एकरूपता तथा संयम बहुत आवश्यक है। ऐसे लोगों को बोला जाता है कि इन पर ईश्वर की बड़ी कृपा होती ।
ये लोग अनेक मामलों में धनी होते हैं। खास कर स्वास्थ्य के मामलों में। छोटी-मोटी चीजों को छोड़ दें तो इन्हें कुछ होता नहीं। हां, कभी मामूली खांसी-सर्दी-बुखार तो आम बात है। कोई बड़ी बीमारी इन्हें नहीं होती। ये नियम परायण लोग होते हैं और इसी नियम परायणता के कारण इनके शरीर की इम्युनिटी कभी कम नहीं होती। ये स्वस्थ रहते हैं। भगवत भजन करते हैं।
आज हम बात करने जा रहे हैं झुमरीतिलैया (पहले बिहार, अब झारखंड) की ललिता देवी के बारे में। ललिता देवी वो हैं, जिन्होंने बाल्यकाल में मुझे अपनी गोद में खिलाया है। हमारे घर आती थीं। हम उनके पास जाया करते थे। श्री सत्य नारायण व्रत कथा क्या है, कैसे होता है, कब करना चाहिए, कब नहीं करना चाहिए और इस व्रत कथा की महत्ता क्या है, इन बातों के बारे में बाल्यकाल में जानकारी देने वाली हमारी चाची (ललिता देवी) ही थी।
मैं अगर आज से 40 साल पहले की बात करूं तो चाची तब भोर में चार बजे के करीब उठ जाती थीं। नित्य क्रिया-कर्म से निवृत्त होने के बाद स्नानादि करके वह सीधे पूजा घर में जाती थीं। रामायण का पाठ करती थीं। चाची के शब्दों से हम लोगों की नींद खुलती थी।
चाची की खुराक कभी ज्यादा नहीं रही। उन्हें हमने दो रोटी से ज्यादा कभी खाते नहीं देखा। चावल भी वह खाती थीं, पर बहुत कम। चलती थीं खूब। गायत्री मंत्र के बारे में बताती थीं। एक-एक शब्द की व्याख्या बताती थीं। शिव चर्चा में क्या-क्या समाहित है, ये भी बताती थीं।
मैं जब भी चाची के सानिध्य में बैठा, उन्होंने राम, रावण, कैकेयी, दशरथ, ताड़का आदि के बारे में ही बताया। इन पात्रों के गुण और अवगुण के बारे में इतने सीधे-सरल शब्दों में वह बताती थीं कि बचपन से ही रामायण की तरफ झुकाव हो गया। यह बात दीगर है कि कुछ अध्याय ही पढ़ पाया अब तक के जीवन में पर सार तो बचपन में ही समझ गया था।
चाची को मैंने कभी अस्पताल जाते नहीं देखा। कोई दवा खाते भी नहीं देखा। मामूली बुखार को छोड़ दें तो उन्हें प्रभु कृपा से आज तक कोई बीमारी नहीं हुई जबकि वह 79 साल की हो चुकी हैं। वह अध्यात्म में डूबी हुई हैं। पूरा जीवन उन्होंने संयम से व्यतीत किया है। न तनाव लेती हैं, न देती हैं। बढ़ती उम्र के कारण थोड़ा कान से सुनना कम हुआ है, बस। शायद यही वजह है कि आज भी वह फिट हैं।
इस 79 साल की उम्र में भी वह पूजा करती हैं। मंदिर जाती हैं। श्लोक गुनगुनाती हैं। अब नजरें थोड़ी कमजोर हो चली हैं। उम्र का असर है।
मैंने चाची को सदैव तुलसी दल खाते देखा। वह मुझे भी देती थीं। चाय स्टील की गिलास में पीती थीं। कहती थीं-कम खाओ, गम खाओ आनंद। पेट में चार कोने हैं। चारों कोना भरके कभी नहीं खाना चाहिए। कोशिश करो कि दो ही कोना खाओ। बहुत भूख लगे तो तीन कोना खा लो। चार कोना कतई, कभी भी मत खाओ।
दरअसल, चाची उन लोगों के लिए एक उदाहरण हैं जो संयमी जीवन जीना चाहते हैं। चाची का पूरा जीवन संयम में बीता। इसी संयम का नतीजा है कि आज वह 79 की उम्र में भी फिट एंड फाइन हैं। चाची के दो बेटे हैं। बड़े का नाम है संजय सिन्हा, छोटे का नाम है सुधीर सिन्हा। दोनों अपने पैरों पर खड़े हैं। बड़ा बेटा श्रम विभाग में है। छोटा बेटा फाइनांस के क्षेत्र में कार्यरत है।
चाची, आप शतक पूरा करें, यही ईश्वर से हमारी कामना है। जैसे अब तक आप निरोगी रही हैं, वैसे ही ईश्वर आपको अंतिम समय तक निरोगी रखे।
लेखक - आनन्द सिंह







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