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फतेहपुर (लखनऊ ब्यूरो)। मिर्गी किसी तरह की छुआछूत या संक्रमण की बीमारी नहीं है। मिर्गी के मरीज की झाड़फूंक कराने की बजाय उसका विशेषज्ञ चिकित्सक से इलाज कराने की जरूरत होती है।
दवा के अलावा इस बीमारी से ग्रसित लोगों को देखभाल और सहानुभूति की भी जरूरत होती है। लेकिन मिर्गी (Epilepsy) से जुड़े कुछ मिथक की वजह से लोग अक्सर इससे पीड़ित व्यक्ति से दूरी बना लेते हैं। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ सुनील भारतीय ने बताया कि मिर्गी एक मेडिकल (medical) समस्या है। जो नर्वस सिस्टम (nurvous system) को प्रभावित करती है। रोगी स्वस्थ होगा या नहीं, यह रोग (disease) की स्थिति पर निर्भर करता है। हर रोगी में लक्षण (symptoms) अलग हो सकते हैं। कुछ मामलों में रोगी पूर्ण स्वस्थ हो जाता है, जबकि कुछ में बेहतर देखभाल व उपचार (treatment) के जरिए रोग में नियंत्रण पाया जा सकता है।
एनसीडी (गैरसंचारी रोग) के नोडल अधिकारी डॉ. आरके वर्मा बताते हैं कि मिर्गी रोगी के साथ समाज और परिवार के सहयोग की जरूरत होती है। ऐसा माहौल विकसित करना चाहिए कि उसका मन अच्छा रहे। उन्होंने बताया कि मिर्गी रोगी के साथ सामान्य व्यवहार रखे। जागरूकता (awareness) की कमी की वजह से मिर्गी का इलाज जादू टोना से कराने लगते है जबकि जिला अस्पताल में मिर्गी के इलाज की बेहतर व्यवस्था है। मिर्गी (Epilepsy) आने पर मरीज को मोजा जूता नहीं सुघाना चाहिये बल्कि तुरंत कुशल चिकित्सक (doctor) के पास ले जाना चाहिये। जिला अस्पताल में हर महीने 8 से 10 मिर्गी रोगी आकर इलाज करा रहे है। मिर्गी के मरीज के साथ परिजनों की भी काउंसलिंग (counseling) की जाती है।







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