












































गंगोत्री देवी स्कूल आफ नर्सिंग की छात्रायें
गोरखपुर। गंगोत्री देवी स्कूल आफ नर्सिंग एंड पैरामेडिकल इंस्टीच्यूट के व्यवस्थापक आशुतोष मिश्रा का मानना है कि हेल्थ सेक्टर में सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर देने भर से ही कुछ नहीं होगा बल्कि गुणवत्तापूर्ण मेडिकल सुविधाओं के लिए अच्छे छात्र तैयार करने होंगे।
उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि गोरखपुर जैसे बड़े शहर में सिर्फ 9 नर्सिंग संस्थान हैं। इससे इलाके की स्वास्थ्य सेवाओं को जैसा होना चाहिए था, वैसा नहीं हो सका। जरूरत इस बात की है कि ऐसे नर्सिंग स्कूल्स और खुलें ताकि लोगों को और सहुलियतें मिल सकें।

मुंशी प्रेमचंद पार्क के बगल में स्थित गंगोत्री देवी स्कूल आफ नर्सिंग एंड पैरामेडिकल इंस्टीच्यूट परिसर में हेल्थजागरणडाटकाम से बातचीत में आशुतोष मिश्रा ने एक सवाल के जवाब में कहा कि गोरखपुर के लिए एम्स सिर्फ स्टैट्स सिंबल है। आपको देखना होगा कि वहां पर सुविधाएं क्या हैं। जितना पैसा एम्स में लगाया गया, उसका आधा भी जिला अस्पताल, अन्य सरकारी अस्पतालों और बीआरडी मेडिकल कालेज में लगाया जाता तो शहर की हेल्थ सर्विसेज में आमूल-चूल परिवर्तन हो जाता। ये सब चुनावी घोषणाओं को पूरा करने की दिशा में उठाया गया कदम है। एम्स, यकीनी तौर पर तब एम्स कहलाएगा जब उसमें एम्स के स्टैंडर्ड के साजो-सामान होंगे। उसके फैकल्टी शानदार होंगे। अभी तो एम्स साजो-सामान और फैकल्टी के अभाव में चल रहा है।
दो साल पहले पूर्व सांसद भीष्म शंकर तिवारी और रीना तिवारी के निर्देश के बाद व्यवस्थापक की भूमिका में आने के उपरांत आशुतोष मिश्रा ने गंगोत्री देवी महाविद्यालय और गंगोत्री देवी स्कूल आफ नर्सिंग एंड पैरामेडिकल इंस्टीच्यूट में कई चेंजेज किए। नतीजा यह निकला कि हर बैच में 60 की 60 सीटें फुल जा रही हैं। पढ़ाई की गुणवत्ता पर उन्होंने काफी ध्यान दिया और उसमें जबरदस्त सुधार हुआ है। यही वजह है कि अब नामांकन के लिए यहां लोग पैरवी करवाते हैं।

आशुतोष मानते हैं कि अनेक बड़े-बड़े मेडिकल कालेज खोलने से बेहतर है कि आप जिन मेडिकल कालेजों को चला रहे हैं, उनके फी स्ट्रक्चर पर ध्यान दें। अगर फी स्ट्रक्चर सही है तो फिर मेधावी लोग तेजी से आगे बढ़ेंगे। अभी यूक्रेन की घटना को ही आप ध्यान में रखें तो बड़े घरानों से या मध्यम घरानों से जो बच्चे यूक्रेन में जाकर मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं, वह फी स्ट्रक्चर के कारण ही है। अपने घर में ये रहते और बढ़िया फी स्ट्रक्चर होता तो ये बच्चे हरगिज यूक्रेन तो नहीं जाते। मेडिकल की सीटों को बढ़ाने की जरूरत है। सीटें कम हैं। कम बच्चे ही डाक्टर बन पा रहे हैं। फिर, जो उन्हें पढ़ाया जा रहा है, उसकी गुणवत्ता को भी ठीक किया जाए। तभी हमारा-आपका हेल्थ सही हो सकेगा।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि जैसे इंजीनियरिंग के क्षेत्र में दुनिया भर के कालेज खुल रहे हैं, उसी तरह से मेडिकल के क्षेत्र में भी मेडिकल कालेज तो खुलें पर उनकी गुणवत्ता का ध्यान रखा जाए। संसाधनों का ध्यान रखा जाए। फैकल्टी का ध्यान रखा जाए। इससे प्रतिभाएं भटकेंगी नहीं। वो घर पर ही रहेंगे।
आशुतोष मानते हैं कि मेडिकल कालेजों में पीपी माडल के तहत नियुक्तियां होनी चाहिए। फिर फैकल्टी का संकट नहीं रहेगा। कोरोना के दिनों को याद करें तो सारा कुछ समझ में आ जाएगा कि फैकल्टी कितनी कम है। दरअसल, मेरा यह मानना है कि लाल फीताशाही के कारण ही यह सब हो रहा है। मेडिकल के फील्ड को माफिया और लाल फीताशाही से मुक्त करना होगा। तभी इसका कल्याण संभव है। कोरोना काल में लोगों ने आपदा में अवसर को खोज ही लिया। ऊपर से लेकर नीचे तक लोग अवसर खोजते रहे। अब सरकार को यह चाहिए कि वह इन दोषियों के खिलाफ जबरदस्त कार्रवाई करे।

आपके संस्थान में ही लोग नामांकन क्यों लें, इस सवाल के जवाब में आशुतोष का दावा है कि गंगोत्री देवी स्कूल आफ नर्सिंग एंड पैरामेडिकल इंस्टीच्यूट की ख्याति दूर-दूर तक है। हमारे शिक्षक मंझे हुए हैं। फी स्ट्रक्चर हमारा सबसे मुफीद है। यहां का प्लेसमेंट रिकार्ड शानदार है। हम बच्चों से फीस तो लेते हैं पर अन्यों की तुलना में बेहद कम। पढ़ाई हम अन्यों की तुलना में सबसे शानदार कराते हैं। फ्री बस सर्विस है।
व्यवस्थापक का दर्द सुनिए
आशुतोष मिश्रा कहते हैं, हमारे बच्चे कोरोना काल में सरकारी सेवाओं में गए। जिले के स्वास्थ्य विभाग के आला अफसरों के आग्रह पर हमने नर्सिंग की बच्चियों को भेजा। उन्होंने 24 घंटे मेहनत की। पहले तय था कि एक सर्टेन अमाऊंट मिलेगा पर एक चवन्नी नहीं मिली। हमारी बच्चियों को एक प्रमाणपत्र तक नहीं मिला। यह गलत है। सरकार को अब तो इस पर ध्यान देना चाहिए।







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