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रंजीव ठाकुर- नेत्र परीक्षण को लेकर किस तरीके का कार्य करतें हैं आप लोग ?
सर्वेश कुमार पाटिल- मोबाइल के बढ़ते प्रयोग के कारण मरीज़ तो आतें हैं लेकिन वे अपनी समस्याओं को सही से बता नहीं पातें हैं। इसलिए मर्ज़ की डायग्नोसिस हम लोगों को खुद ही करना पड़ता है।बुज़ुर्ग मरीज़ मोतियाबिंद के कारण उत्पन्न समस्याओं को सही से बता नहीं पाते हैं। हम लोग परीक्षण के उपरान्त निर्णय लेते हैं कि ऑपरेशन होना है कि नहीं।
आमजन मानस के नेत्र सम्बन्धी समस्याओं का प्रथम पंक्ति में निदान हम लोग करतें हैं उसके बाद नेत्र सर्जन आतें हैं। हम लोग मरीज़ों को मोटीवेट करतें हैं कि आँख का ऑपरेशन कराने में ही फायदा है। जिससे उसकी रोशनी को बेहतर किया जा सके।
रंजीव ठाकुर- मरीज़ की मनःस्थिति और वास्तविक स्थिति में आप लोग तालमेल कैसे बिठातें हैं?
सर्वेश कुमार पाटिल- हम लोग वैज्ञानिक तरीके से मर्ज़ खोजतें हैं। मोतियाबिंद होने पर पास की रोशनी ठीक रहती है लेकिन दूर की रोशनी बाधित हो जाती है। अगर मरीज़ से पूछें तो वह अजीब अजीब तरह की बातें बताता है। उम्र बढ़ने के कारण चालीस से ऊपर होने पर नज़दीक का चश्मा लगने लगता है।
रंजीव ठाकुर- मोबाइल का ज़माना है बच्चों में इसका प्रचलन बढ़ा है। काम उम्र के लोगों को भी इस तरह की बीमारियां हो रहीं हैं ?
रंजीव ठाकुर- इस्तेमाल की अपेक्षा मरीज़ों की संख्या नहीं बढ़ी है लेकिन कुछ मरीज़ बढे हैं। जिसका इलाज हमारे नेत्र चिकित्सक करतें हैं। कई बार दवा से ही ठीक हो जाता है, कई बार चश्मा लगाना पड़ता है।
रंजीव ठाकुर- ज़्यादा मोबाइल इस्तेमाल करने वाले को क्या सलाह देना चाहेंगें ?
सर्वेश कुमार पाटिल- मोबाइल या कंप्यूटर का इस्तेमाल लगातार मत करें। बीच बीच में ब्रेक देतें रहें।







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