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ब्रैकीथेरेपी सर्वाइकल कैंसर के मरीजों में जीवित रहने की संभावना बढ़ाती है।

भारत में दुनिया के सर्विकल कैंसर से होने वाली मौतों का आंकड़ा पूरी दुनिया का लगभग एक-चौथाई है। लैंसेट ग्लोबल में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार 2018 में सर्विकल कैंसर से 60,078 मौतें हुई।

हे.जा.स.
December 29 2020 Updated: January 13 2021 03:05
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ब्रैकीथेरेपी सर्वाइकल कैंसर के मरीजों में जीवित रहने की संभावना बढ़ाती है। प्रतीकात्मक फोटो

कानपुर । भारत में सर्विकल कैंसर से महिलाएं सबसे ज्यादा पीड़ित होती है। रीजेंसी सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल, कानपुर के आंकोलोजिस्ट ने कहा है कि अब समय आ गया है कि इस कैंसर के लिए ट्रीटमेंट जैसे कि ब्रैकीथेरेपी के प्रति जागरूकता फैलाई जाए। हालांकि इसकी रोकथाम की जा सकती है फिर भी भारत में इस कैंसर की मृत्यु दर अन्य कैंसर से ज्यादा है। भारत में दुनिया के सर्विकल कैंसर से होने वाली मौतों का आंकड़ा पूरी दुनिया का लगभग एक-चौथाई है। लैंसेट ग्लोबल में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार 2018 में सर्विकल कैंसर से 60,078 मौतें हुई।

सर्वाइकल कैंसर होने की औसत उम्र 40- 50 वर्ष है और इसी उम्र की महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर अधिकतम पाया जाता है। इस कैंसर के मुख्य लक्षण है - अनियमित ब्लीडिंग होना, माहवारी के खत्म होने के बाद भी ब्लीडिंग होना और अनियमित डिस्चार्ज होना ।

डॉ नीरजा मौर्या, कंसलटेंट- रेडिएशन ऑन्कोलॉजी, रीजेंसी सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल, कानपुर ने कहा, “सर्विक्स कैंसर के ट्रीटमेंट के लिए रेडियोथेरेपी इबीआरटी और ब्रैकीथेरेपी की एहम भूमिका है । इबीआरटी और ब्रैकीथेरेपी दोनों ही एडवांस सर्विक्स कैंसर (I B- IV A) में स्टैण्डर्ड ट्रीटमेंट है । इसके साथ ही पहले स्टेज में ही सिर्फ ब्रैकीथेरेपी करके सर्जरी के रिस्क को हम कम कर सकते है”

एक शोध के अनुसार कीमोथेरेपी या इबीआरटी (एक्सटर्नल बीम रेडिएशन थेरेपी) के बाद ब्रैकीथेरेपी करने से मरीज के बचने की सम्भावना बढ़ जाती है। अमेरिका में हुई एक स्टडी में पाया गया कि ऐसी महिलाएं जिन्होंने इबीआरटी कराया है उसकी तुलना में ब्रैकीथेरेपी कराने वाली महिलाओं में पिछले 4 साल के सर्वाइवल में 12% की वृद्धि हुई है।

डॉ आशीष राज कुलश्रेष्ठ, कंसलटेंट- रेडिएशन ऑन्कोलॉजी, रीजेंसी सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल, कानपुर ने कहा, " हमारे संस्थान में  सी टी स्कैन के द्वारा प्लान करके ब्रैकीथेरेपी की जाती है जिसके द्वारा ट्यूमर को  अच्छे कवरेज के साथ साथ उसके साइड इफेक्ट का खतरा भी काफी कम हो जाता है और इसमें ट्रीटमेंट और रिकवरी मैं समय भी काफी कम लगता हैI हम अक्सर अपने मरीजों को इस मिनिमली इनवेसिव  तकनीक की सलाह देते हैं क्योंकि  इससे  कम साइड इफेक्ट के साथ-साथ सर्वाइवल चांस भी अच्छा रहता है और इसको ओपीडी बेसिस पर भी कर सकते हैंI"

जब प्रोसीजर कोर्स ख़त्म हो जाता है तो फालोअप अपॉइंटमेंट आमतौर पर लगभग 4 से 6 हफ्ते के लिए निर्धारित किया जाता है। यह अपॉइंटमेंट यह जांचने के लिए होती है कि ट्रीटमेंट ठीक चल रहा है या नहीं और कोई संभावित साइड इफेक्ट तो नहीं है?

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