











































डा. आर.एन. सिंह
गोरखपुर। राजस्थान के दौसा की लेडी डाक्टर डा. अर्चना शर्मा ने खुदकुशी नहीं की वरन लोगों ने उन्हें मार डाला। सिस्टम तो बना हुआ था। सिस्टम चलाने वालों ने सिस्टम को तोड़ दिया। उसका नतीजा ये हुआ कि डा. अर्चना ने मौत को गले लगा लिया। मुझे लगता है, ये सिस्टम तोड़ने वालों की गलती है। अर्चना ने खुदकुशी नहीं की। उन्हें सिस्टम वालों ने जबरिया मार डाला।
आज से पांच साल पहले जस्टिस काटजू ने एक व्यवस्था दी थी कि अगर इस किस्म की कोई घटना हो जाए, जिसमें इलाज के दौरान मरीज की मौत हो जाए तो तब तक प्रथमिकी दर्ज न की जाए, जब तक डाक्टरों की एक टीम बना कर पूरे मामले की जांच न हो। टीम की अनुशंसा के मुताबिक ही आगे की कोई कार्रवाई की जाए। जस्टिस काटजू ने जो व्यवस्था दी थी, उसका एक रत्ती भी पालन नहीं किया गया। मुझे लगता है, डा. अर्चना के प्रकरण पर सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान ले सकता है क्योंकि इस प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की ही अवहेलना हुई है।

जहां तक मैं समझ पाया हूं, डा. अर्चना के केस में इस आदेश की सौ प्रतिशत अवमानना की गई है। राजस्थान में पुलिस और प्रशासन ने सत्ता की हनक में अपनी शक्तियों का वीभत्स मिसयूज किया है। चंद घंटों में एक चिकित्सक के ऊपर धारा 302 की जैसी कार्रवाई कर दी गई, उतनी तेजी तो कुख्यात बदमाशों पर भी कार्रवाई करने में नहीं दिखाई जाती। ठीक है कि प्रशासन पर दबाव था तो क्या उस दबाव से खुद को बचाने के लिए आप मनमानी करेंगे।
चंद अराजक तत्वों के धरना-दबाव-प्रताड़ना से तंग आकर आप एक सम्मानित महिला चिकित्सक के खिलाफ धारा 302 के तहत केस दर्ज कर लेंगे। अगर धारा 302 के तहत केस न होता तो आज डा. अर्चना हम लोगों के बीच होती। उनका ट्रैक रिकार्ड शानदार रहा है। लेकिन, इन बातों पर कानून के अंधे सिपाहियों ने ध्यान ही नहीं दिया। कर दिया धारा 302 के तबत मुदमा दर्ज और छोड़ दिया महिला चिकित्सक को घुट-घुट कर मरने के लिए। अंततः डिप्रेस्ड होकर उन्होंने एक सुसाइड नोट लिखा और अपनी जिंदगी खत्म कर ली।
पूरे केस को देखने के बाद मुझे ऐसा लगता है कि इस पूरे प्रकरण में गंभीर अपराध तो वहां की पुलिस और प्रशासन के अफसरों और अराजक तत्वों ने किया है। यह ठीक है कि घटना का संज्ञान लेकर राजस्थान सरकार ने तत्काल अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई की है पर इतने बड़े अपराध के लिये मात्र ट्रांसफर व सस्पेंशन का कदम पर्याप्त नहीं है। संबंधित अपराधियों (प्रशासन व अराजक सामाजिक तत्व) पर दफा 302 के तहत उन्हें भी मुजरिम बनाना ही यथोचित होगा। फिर भी राजस्थान सरकार ने कम से कम कुछ दंड तो तत्काल दिया है। यह बात अलग है कि जुर्म के हिसाब से वह अपर्याप्त है। दरअसल यहां सिर्फ एक चिकित्सक की हत्या नहीं हुई है। यहां हजारों सम्मानित नागरिकों के भरोसे की हत्या हुई है जिनको जीवित रहते वह चिकित्सिका बचा सकती। बड़ा अपराध हुआ है यह राजस्थान में।
मैं मानता हूं और मांग करता हूं कि इस पूरे एपिसोड में केंद्र के शीर्ष सदन व नेताओं को चिकित्सकों की सुरक्षा के लिये बने हुए कानून को कड़ाई से लागू कराया जाए। यह सौ फीसद सत्य है कि जब चिकित्सक इलाज करेगा तो लोग स्वस्थ होंगे पर कभी-कभी वह हर प्रयास के बाद भी मरीज को नहीं बचा पायेगा। डाक्टर, सिर्फ डाक्टर होता है। वह अंतिम कोशिश यही करता है कि मरीज बच जाए। अगर वह नहीं बचा पाता है तो मानना पड़ेगा कि मौत शास्वत सत्य है। इसे सभी को स्वीकारना ही होगा
मुझे इस बात का बेहद अफसोस है कि चिकित्सक समुदाय व मीडिया को छोड़कर लोकतंत्र के सभी स्तंभों ने खामोशी ओढ़ रखी है। यह खामोशी खतरनाक है और सच मानिए, बेहद पीड़ादायक है। अगर याद करें तो यह वही चिकित्सक समुदाय है, जिसने करोना के त्रासद काल में लाखों लोगों की जान बचाने के लिये अपनी व अपने परिजनों की प्राणाहुति दी है। कोई 1300 चिकित्सक व इससे अधिक उनके परिजन, नागरिकों को करोना से उबारने में मृत्यु को प्राप्त हुए। इन फ्रंट वारियर्स के सम्मान में फूलों की बारिश, थाली बजाना, देश भर में दीपावली को भी मात देने वाला उजाला कराना आदि सम्मान की पराकाष्ठाएं अयोजित की गईं थीं पर मेरी अल्प जानकारी में अभीतक किसी बड़े राजनेता ने संवेदना के दो शब्द भी नहीं कहे हैं। इतना बदलाव चंद महीनों में आश्चर्यजनक व कष्टदायक है। क्यों, लोगों की जुबान पर ताला पड़ गया है?








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