












































प्रतीकात्मक
नयी दिल्ली (भाषा)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को कहा कि भारतीय छात्र भाषायी बाध्यताओं के बावजूद चिकित्सा शिक्षा के लिए कई सारे छोटे देशों का रुख कर रहे हैं, ऐसे में इस प्रकार की सुविधाएं देश में ही उपलब्ध कराने के लिए निजी क्षेत्र को व्यापक स्तर पर सामने आकर अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी।
आम बजट-2022 में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए किए गए प्रावधानों पर केंद्रीय स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से आयोजित एक वेबिनार का उद्घाटन करने के बाद प्रधानमंत्री ने सुझाव दिया कि चिकित्सा शिक्षा को बढ़ावा देने को ध्यान में रखते हुए जमीन आवंटन के लिए राज्य सरकारें भी अच्छी नीतियों का निर्माण कर सकती हैं ताकि भारत बड़ी संख्या में चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों की फौज तैयार कर वैश्विक मांग को भी पूरी कर सके।
प्रधानमंत्री की यह बात बहुत मायने रखती है क्योंकि रूस की सैन्य कार्रवाई के मद्देनजर युद्धग्रस्त यूक्रेन में बड़ी संख्या में भारतीय छात्र फंसे हुए हैं और उन्हें स्वदेश वापस लेने के लिए सरकार को कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है।
मोदी ने अपने संबोधन के दौरान यूक्रेन में फंसे भारतीय छात्रों का कोई सीधा उल्लेख नहीं किया। उन्होंने कहा कि विदेशों में जाकर चिकित्सा शिक्षा की पढ़ाई के लिए विदेश जाने के कारण देश का पैसा बड़ी संख्या में बाहर भी जाता है। ज्ञात हो कि यूक्रेन में फंसे अधिकतर छात्र चिकित्सा क्षेत्र में शिक्षा हासिल करने के लिए वहां हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘शिक्षा, खासकर चिकित्सा शिक्षा के लिए हमारे बच्चों को छोटे देशों मे जाना पडता है। वहां उन्हों भाषयी समस्याओं से भी दो-चार होना पड़ता है। इसके बावजूदवह जा रहे हैं...क्या हमारा निजी क्षेत्र बड़े स्तर पर इसमें प्रवेश नहीं कर सकता है? क्या हमारी राज्य सरकारें इसके लिए भूमि आवंटन करने को अच्छी नीतियों का निर्माण नहीं कर सकती?’’ इस क्षेत्र में कमियों को पूरा करने के लिए भारत को अपने संसाधनों का उपयोग करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पिछले सात सालों में केंद्र सरकार ने देश के स्वास्थ्य ढांचे में सुधार और बदलाव किए हैं और अब उसकी कोशिश गंभीर बीमारियों के इलाज की सुविधाएं ब्लॉक स्तर पर पहुंचाने की है।
उन्होंने यह भी कहा कि उनकी सरकार का प्रयास आधुनिक प्रौद्योगिकी के माध्यम से देश के हर व्यक्ति तक किफायती इलाज पहुंचाने का है।
स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए बजट प्रावधानों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘यह बजट पिछले साल से स्वास्थ्य देखभाल तंत्र में सुधार और व्यापक बदलाव करने के हमारे प्रयासों को विस्तार देता है। हमने अपने स्वास्थ्य देखभाल तंत्र में एक सर्वसमावेशी रुख अपनाया है।’’
प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार का ध्यान स्वास्थ्य पर तो है ही, इसके साथ ही उसकी कोशिश आयुष जैसी पारंपरिक भारतीय चिकित्सा पद्धति में शोध को प्रोत्साहन देकर स्वास्थ्य देखभाल तंत्र में उसकी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने पर भी है।
उन्होंने कहा, ‘‘आधुनिक प्रौद्योगिकी के माध्यम से देश के हर व्यक्ति, हर हिस्से तक बेहतर और किफायती स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने पर भी सरकार का विशेष ध्यान है। हमारा प्रयास है कि गंभीर बीमारियों के इलाज की स्वास्थ्य सुविधाएं ब्लॉक स्तर पर हों, जिला स्तर पर हों, गांवों के नजदीक हों।’’
उन्होंने कहा कि इन सुविधाओं से जुड़ी अवसंरचना की देखभाल और समय-समय पर उसमें सुधार भी जरूरी है और इसके लिए निजी और दूसरे क्षेत्र को भी ज्यादा ऊर्जा के साथ आगे आना होगा।
प्रधानमंत्री ने कहा कि प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल नेटवर्क को सशक्त करने के लिए डेढ़ लाख ‘हेल्थ एंड वेलनेस’ केंद्रों के निर्माण का काम तेजी से चल रहा है और अभी तक 85,000 से अधिक केंद्रों में नियमित जांच, टीकाकरण और जांच जैसी सुविधाएं पहुंचाई जा चुकी हैं।
उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे स्वास्थ्य सेवाओं की मांग बढ़ रही है, उसके अनुसार सरकार कौशल संपन्न स्वास्थ्य पेशेवर तैयार करने का भी प्रयास कर रही है और इसे ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल से जुड़े मानव संसाधन तैयार करने के लिए बजट में पिछले साल की तुलना में बड़ी वृद्धि की गई है।
आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि यह ग्राहक और स्वास्थ्य देखभाल प्रदाता के बीच एक आसान इंटरफेस उपलब्ध कराता है।
उन्होंने कहा, ‘‘इससे देश में उपचार पाना और देना, दोनों बहुत आसान हो जाएंगे। इतना ही नहीं, यह भारत के गुणवत्तापूर्ण और किफायती स्वास्थ्य तंत्र की वैश्विक पहुंच को भी आसान बनाएगा।’’







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