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हुज़ैफ़ा अबरार- ऑपरेशन के बाद आपको कैसा लग रहा है? कोई परेशानी तो नहीं है ?
मरीज़ युवती- नहीं।
हुज़ैफ़ा अबरार- डॉक्टर साहब ने आपको नया जीवन दिया है। आप उनका धन्यवाद नहीं देंगीं!
डॉ रवि शंकर- मैं इनका थैंक यू बोलता हूँ क्योंकि इसने हिम्मत करके ऑपरेशन कराया है। नहीं तो धारणा यह है कि मिर्गी का इलाज नहीं हो सकता है, हम झाड़ फूँक कराएँगे। गाँव से आकर इतना समझदार होना और ऑपरेशन के लिए हिम्मत जुटाना, इसके लिए ये तारीफ के काबिल हैं।
हुज़ैफ़ा अबरार- आपको मेदांता हॉस्पिटल में किसने भेजा था ?
युवती के पिता- गोरखपुर के एक संभ्रांत व्यक्ति के वहां पर मैंने डॉक्टर ठक्कर का नाम सुना था। उन लोगों ने बताया कि वही तुम्हारी बेटी को ठीक कर सकतें है। मैं उनसे लोहिया अस्पताल में मिला। वहां जांच हुई फिर मेदांता में आये।
रंजीव ठाकुर- आप पूरी तरीके से संतुष्ट हैं ?
युवती के पिता- हाँ, मैं पूरी तरह से संतुष्ट हूँ।
रंजीव ठाकुर- क्या ऑपरेशन के बाद से बिटिया पूरी तरह ठीक हैं?
युवती के पिता- हाँ, पूरी तरह से ठीक है।
डॉ रवि शंकर- मरीज़ को मिर्गी थी। तीन चार दवाईयों से कण्ट्रोल नहीं हो रहा था। जब स्कैन कराया गया तब पता चला कि दिमाग के एक हिस्से में कड़ापन आ गया था। यह निश्चित हो जाने पर ऑपरेशन का निर्णय लिया गया और दिमाग के उस हिस्से को निकाल दिया गया जिसके कारण मिर्गी के दौरे पड़ते थें।
डॉ रवि शंकर- मिर्गी के बारे में भारत सहित दुनिया में एक अलग सी अवधारणा है। इस अवधारणा को ख़तम करने के लिए और जागरूकता पैदा करने के लिए हर साल फरवरी के दूसरे सोमवार को वर्ल्ड एपिलेप्सी डे मनाया जाता है। मिर्गी के दस प्रतिशत मरीज़ ऐसे होतें हैं जिनका इलाज दवाईयों से सम्भव नहीं हो पाता है। ऐसे मरीज़ों का ऑपरेशन करके मिर्गी के दौरों से निजात दिलाया जाता है। ये मरीज़ उसी दस प्रतिशत मरीज़ों में से थी।
रंजीव ठाकुर- कितना खर्चा आता है ?
डॉ रवि शंकर- सभी प्रकार की प्रक्रिया को जोड़कर लगभग दो लाख रुपये का खर्चा आता है। इतना ही खर्चा सरकारी अस्पतालों में भी आ जाता है। मिर्गी के बारे में मिथक और भ्रांतियां इतना ज़्यादा हैं कि जब तक जनता को शिक्षित नहीं किया जाएगा, तब तक इस बीमारी का सही इलाज पाना बहुत मुश्किल है ।







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