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मेरठ (लखनऊ ब्यूरो)। यूँ तो प्रत्येक वर्ष उचित खानपान की आदतों और पोषण के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए 1 सितम्बर से 7 सितम्बर तक राष्ट्रीय पोषण सप्ताह मनाया जाता है। लेकिन बहुत बड़ी आबादी है जो पोषक आहार से वंचित रह जाती है और कई बार मोटापे की समस्या मुंह बाये रहती है।
राष्ट्रीय परिवार एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण (National Family and Health Survey) की स्टडी रिपोर्ट में बताया गया है कि मेरठ जिले के बच्चों में पोषण का संतुलन (nutritional balance) बिगड़ चुका है और मोटापे (obesity) की समस्या दो गुनी हो गई है। पिछले लगभग 6 सालों में 0.7% बच्चों में ओवर वेट की समस्या बढ़ गई है। सर्वेक्षण में इस वर्ष 1.3% बच्चे मोटापे से ग्रस्त मिले हैं जबकि 2015-16 में यह आंकड़ा महज 0.6 प्रतिशत था।
दूसरी तरफ जिले में पांच साल तक के चौथाई बच्चे संतुलित वजन (low balanced weight) के निचले स्तर पर है। सर्वेक्षण के अनुसार बच्चों की 23.7 फीसदी आबादी में अभी भी दुबलेपन (thinness) की समस्या है। बीते पांच सालो में इस स्थिति में थोड़ा सुधार जरूर हुआ है लेकिन अभी भी आंकड़ा चिंताजनक स्तर पर है। वर्ष 2015-16 में ये आंकड़ा 35.2 प्रतिशत था। जिले में बच्चों की 10 फीसदी आबादी कुपोषित भी है।
स्टडी रिपोर्ट में बताया गया है कि दो साल तक की 92 फीसदी आबादी को संपूर्ण आहार ही उपलब्ध नहीं हैं। पोषण संबंधी तमाम योजनाएं चलाने के बाद भी मात्र 0.2 फीसदी आबादी ही जागरूक हो सकी है। वर्ष 2015-16 में इसका आंकड़ा 8.5% था जो 2019-21 में बढ़ कर 8.7 प्रतिशत पहुंच गया है।
विशेषज्ञों के मुताबिक पोषण के अभाव (lack of nutrition) में बच्चों में तमाम तरह की बीमारियां पनप सकती हैं। कम उम्र में ही मोटापे या दुबलेपन से बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता की कमी, शारीरिक और मानसिक विकास में कमी, मानसिक रोग (mental diseases in children) जैसी समस्या पैदा हो सकती है। वहीं उनकी कार्यक्षमता में भी कमी आ सकती है। जिससे आगे चलकर उनमें गंभीर बीमारियां हो सकती हैं।







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