











































गुरु गोरक्षनाथ इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज में आयोजित दीक्षा पाठ्यचर्या समारोह के ग्यारहवें दिन व्याख्यान देते राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति आयोग, मेडिकल असेसमेंट बोर्ड के अध्यक्ष डॉ रघुराम भट्ट
गोरखपुर। राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति आयोग, मेडिकल असेसमेंट बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. रघुराम भट्ट ने कहा कि आयुर्वेद भारतीय ज्ञान परंपरा का अमृत तत्व है जो दुनिया में मानवता को स्वस्थ रखने में सदैव अमूल्य योगदान देता आया है। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुरूप नए युग की शुरुआत हो गई है। यह आयुर्वेद और भारतीय ज्ञान परंपरा के माध्यम से मानव कल्याण के पुनर्जागरण का युग है। भावी युग भारत का युग है। ऐसे में आयुर्वेद के छात्रों की जिम्मेदारी है कि वे भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्स्थापित करने के लिए गुणवत्तापूर्ण शोध एवं अनुसंधान की तरफ अग्रसर हों।
डॉ. भट्ट शनिवार को महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय, आरोग्यधाम की संस्था गुरु गोरक्षनाथ इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (आयुर्वेद कॉलेज) में बीएएमएस प्रथम वर्ष के दीक्षा पाठ्यचर्या (ट्रांजिशनल करिकुलम) समारोह के ग्यारहवें दिन एक विशिष्ट सत्र में छात्रों को संबोधित कर रहे थे।
नवप्रेवशी विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए उन्होंने कहा कि आयुर्वेद में भाषा का बहुत महत्व है। आयुर्वेद को सीखने, जानने व उसके प्रभावी उपयोग के लिए संस्कृत को जानना अपरिहार्य है। आयुर्वेद के क्षेत्र में गहन जानकारी के लिए हिंदी, अंग्रेजी व संस्कृत के साथ ही भारतीय ज्ञान परंपरा की जितनी भी भाषाएं सीख सकें, वह लाभप्रद होगा। डॉक्टर भट्ट ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा एक बार पुनः प्रतिष्ठित हो रही है विगत छह-सात वर्षों में आयुर्वेद व योग ने जो प्रतिष्ठा हासिल की है वह दुनिया के समक्ष प्रमाणित है।
उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को नए युग की साधना का दीप बनना होगा। आयुर्वेद से आरोग्यता के अभियान का आत्म तत्व बनना होगा। भारतीय ज्ञान परंपरा की पुनः प्रतिष्ठा हेतु शोध व अध्ययन के साथ खुद को खपाना होगा। उन्होंने कहा कि इंटीग्रेटेड चिकित्सा प्रणाली के बल पर भारत पूरी दुनिया में चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में श्रेष्ठतम होने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ चला है और इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका आयुर्वेद की है।
मानक संस्था के रूप में है गुरु गोरक्षनाथ इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज की मान्यता
मेडिकल असेसमेंट बोर्ड के अध्यक्ष डॉ भट्ट ने कहा कि गुरु गोरक्षनाथ इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज की मान्यता एक मानक संस्था के रूप में है। उन्हें पूर्ण विश्वास है कि यह आयुर्वेद कॉलेज एक ऐसा मॉडल बनेगा जिसे देश दुनिया में प्रस्तुत किया जा सकेगा।
संस्थान देख यह स्पष्ट है कि यहां बेहतरीन इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल खड़ा हो चुका है। यह कॉलेज भारतीय ज्ञान परंपरा की गुणवत्ता, अध्ययन, अध्यापन के उच्चतम स्वरूप, शोध के बल पर यह आदर्श शिक्षण संस्थान बनेगा। हम आयुष के लोग इस कॉलेज को इस रूप में देखते हैं कि हम लोगों को यह बता सकें कि आयुर्वेद कॉलेज देखना हो तो गोरखपुर जाएं। उन्होंने कहा कि पूर्ण विश्वास है कि यह संस्थान भारतीय ज्ञान परंपरा के अद्वितीय स्वरूप में चिकित्सा विज्ञान की दुनिया को लोक कल्याणार्थ प्रकाशित करेगा।
शिक्षा नारी सशक्तिकरण की पहली व अनिवार्य शर्त: शीलम
एक अन्य सत्र में समाधान फाउंडेशन की कार्यक्रम निदेशक शीलम वाजपेयी ने नारी सशक्तिकरण विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि शिक्षा नारी सशक्तिकरण की पहली शर्त है। बालिकाओं की शिक्षा के क्षेत्र में गोरक्षपीठ की अहम भूमिका रही है। इस पीठ के ब्रह्मलीन महंतद्वय दिग्विजयनाथ जी और अवेद्यनाथ जी ने इसके लिए स्कूलों की स्थापना शुरू की। पीठ के वर्तमान महंत एवं पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने गुरुओं की इस परंपरा को ऊंचाई दी है।
उन्होंने नारी सशक्तिकरण के लिए "सिक्स एस" शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन, सामाजिक न्याय, संवेदनशीलता और समता पर जोर दिया। साथ ही महिला सशक्तिकरण के लिए चलाई जा रहीं केंद्र व उत्तर प्रदेश सरकार की योजनाओं के बारे में चर्चा की। अन्य सत्रों में डीएवी पीजी कॉलेज, सिवान, बिहार की अस्सिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अपर्णा पाठक ने तनाव प्रबंधन, महायोगी गुरु गोरक्षनाथ इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दीपू मनोहर ने "हिस्ट्री ऑफ एनाटोमी" विषय पर व्याख्यान दिए।
कार्यक्रमों में महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय, आरोग्यधाम के कुलपति मेजर जनरल डॉ अतुल वाजपेयी, कुलसचिव डॉ. प्रदीप कुमार राव, गुरु गोरक्षनाथ इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के प्राचार्य डॉ. पी. सुरेश, प्रो. (डॉ) एसएन सिंह, एसोसिएट प्रो. डॉ. पीयूष वर्षा, एसोसिएट प्रो. डॉ. प्रिया नायर, असिस्टेंट प्रो. डॉ. सुमित कुमार, असिस्टेंट प्रो. डॉ. प्रज्ञा सिंह आदि की सक्रिय सहभागिता रही।







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