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वाराणसी (लखनऊ ब्यूरो)। मेरुदण्ड शरीर का वह अहम हिस्सा है जो मानव को सीधा, सर उठा कर चलने का सम्बल देता है लेकिन कई बार रीढ़ की हड्डी के विकार कमर तोड़ देते है और टेढ़ापन तो जीवन को ही नतमस्तक कर देता है। बीएचयू में इसका इलाज शुरू हो गया है।
बीएचयू (BHU) चिकित्सा विज्ञान संस्थान में मेरुदण्ड के टढ़ेपन का उपचार हो रहा है। ट्रामा सेंटर में आधुनिक मशीन न्यूरो मानिटर (neuro monitor) कार्य कर रही है जिसके उपचार से रीढ़ की हड्डी में बीमारी होने के कारण लकवा मारने की आशंका कम हो रही है।
मेरुदण्ड का टेढ़ापन (spine curvature) कई विकृतियों को साथ लेकर आता है। कमर में टेढ़ापन होने से हमेशा दर्द बना रहता है और कभी सांस लेने में भी परेशानी होने लगती है। बच्चों में यह रोग उम्र के साथ ठीक हो जाता है लेकिन बड़ों में ऐसी परेशानी सर उठा कर चलने का मनोबल तोड़ देती है।
दरअसल थोरैसिक स्कोलियोसिस (thoracic scoliosis) एक ऐसी बीमारी है जिसमें रीढ़ की हड्डी में टेढ़ापन आ जाता है। मेरुदण्ड में खिंचाव (spinal cord strain) के कारण मरीजों को लकवा (paralyzed) मारने का भी खतरा बढ़ जाता है। पीठ के निचले भाग में जब समस्या होती है है तो इसे लंबर स्कोलियोसिस (lumbar scoliosis) कहा जाता है।
प्रो सौरभ सिंह, आचार्य, बीएचयू ट्रामा सेंटर (Trauma Center) ने बताया कि मेरुदण्ड की समस्या (spinal problems) होने पर बच्चों को रीढ़ की हड्डी की टेढ़ापन की डिग्री के आधार पर शारीरिक चिकित्सा व ब्रेस लगाने की अक्सर सलाह दी जाती है। कमर का टेढ़ापन (waist curvature) धीरे–धीरे बच्चों की उम्र के साथ सुधर जाता है लेकिन बड़ों में उम्र बढ़ने के साथ रीढ़ की हड्डी का टेढ़ापन बढ़ता जाता है और कूबड़ (hump) निकलने की समस्या हो जाती है।
डॉ सौरभ सिंह का कहना है कि मांसपेशियों के कमजोर होने से या जन्मजात रीढ़ की हड्डी (spinal treatment) में विकार होने से ये समस्याएं आती हैं। मांसपेशियों का कुपोषण, मस्तिष्क पक्षाघात, रीढ़ की हड्डी की टीबी या स्पाइनल बिफिडा भी इसका कारण हो सकता है।







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