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नई दिल्ली। भारत में जन्म लेने वाले हर 800 से 1000 बच्चों में से किसी एक को यह समस्या प्रभावित करती है। डाउन सिंड्रोम (Down's Syndrome) के साथ जन्मे बच्चे देखने में तो अलग लगते ही हैं साथ ही इनका मानसिक विकास भी धीमी गति से होता है। इन बच्चों को कुछ कई तरह की सेहत संबंधी परेशानियों का भी खतरा रहता है। लेकिन यह जरुरी नहीं। कई बच्चे एकदम हेल्दी होते हैं। डाउन सिंड्रोम को 'ट्राइसोमी 21' के नाम से भी जाना जाता है।
डाउन सिंड्रोम के कारण
नॉर्मली बच्चा 46 क्रोमोसोम के साथ पैदा होता है। 23 क्रोमोसोम उसे अपने पिता से और 23 क्रोमोसोम उसे अपनी मां से मिलते हैं। डाउन सिंड्रोम की स्थिति तब होती है जब माता या पिता अतिरिक्त क्रोमोसोम का योगदान करते हैं। जब बच्चे में ये अतिरिक्त 21वां क्रोमोसोम आ जाता है तो उसकी बॉडी में इनकी संख्या 46 से बढ़कर 47 हो जाती है जो डाउन सिंड्रोम की वजह बनता है।

डाउन सिंड्रोम के लक्षण

डाउन सिंड्रोम से जुडी समस्याएँ
भ्रूण जब गर्भाशय में हो तब सरकारी निर्देशों का पालन करते हुए जांच के जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि बच्चा डाउन सिंड्रोम से पीड़ित है या नहीं। गोरखपुर के वरिष्ठ बाल एवं शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ आर एन सिंह बतातें हैं कि पता लग जाने के बाद भी इसका इलाज मुमकिन नहीं है। इस प्रकार के बच्चों की जन्मजात इम्युनिटी कमज़ोर होती है। ऐसे बच्चों को बोलने की समस्या, स्वास संबंधी रोग, जन्मजात ह्रदय रोग और ब्लड कैंसर जय रोगों का सामना करना पड़ता है। ह्रदय रोग से ग्रसित डाउन्स सिंड्रोम के तकरीबन 50% बच्चों की एक वर्ष की उम्र पहुंचने से पहले मृत्यु हो जाती है। भौतिक विकास कम होता है। 13 से 54% तक डाउन्स वाले बच्चों में हाइपोथायरायडिज्म पाया जाता है। 20% बच्चे आँत या पेट सम्बन्धी रोग से होतें हैं। सुनने संबंधी परेशानियाँ पायीं गयीं हैं।
इन बच्चों में जो रोग दिखाई पड़े, उसका इलाज किसी विशेषज्ञ से या उच्च संस्थानों में ही कराना हितकर होगा। इलाज न हो पाने की स्थिति में बच्चे के साथ बुरा बर्ताव करने की जगह उन्हें प्यार दें। डाउन सिंड्रोम से पीड़ित बच्चे और वयस्क आज भी सही देखरेख की वजह से अच्छी जिंदगी बिता रहे हैं। डाउन सिंड्रोम से पीड़ित बच्चे नॉर्मल बच्चों की तरह अपना काम खुद से आसानी से कर सकते हैं बस उन्हें घर-परिवार के सपोर्ट की जरूरत होती है। स्पीच, फिजियोथेरोपी का भी सहारा लिया जा सकता है।







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