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अपोलो अस्पताल के डॉक्टरों ने एक महिला के पेट से निकाला 47 किलोग्राम का ट्यूमर, बचाई जान

अहमदाबाद में डॉक्टरों ने एक महिला के पेट से 47 किलोग्राम का ट्यूमर निकालकर उसे नया जीवन दिया है। ट्यूमर की वजह से महिला का वजन करीब दोगुना हो गया था और वह बहुत परेशान थी।

एस. के. राणा
February 16 2022 Updated: February 17 2022 00:44
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अपोलो अस्पताल के डॉक्टरों ने एक महिला के पेट से निकाला 47 किलोग्राम का ट्यूमर, बचाई जान प्रतीकात्मक

अहमदाबाद। गुजरात के अहमदाबाद में डॉक्टरों ने एक महिला के पेट से 47 किलोग्राम का ट्यूमर निकालकर उसे नया जीवन दिया है। ट्यूमर की वजह से महिला का वजन करीब दोगुना हो गया था और वह बहुत परेशान थी। ट्यूमर (tumor) निकलने के बाद महिला का वजन मात्र 49 किलोग्राम रह गया है।

जब शांति (बदला हुआ नाम) को शहर के एक अस्पताल के ऑपरेशन थियेटर से बाहर निकाला गया, तो उसे लगा जैसे सचमुच एक बड़ा वजन उसके शरीर के ऊपर से हट गया हो। गुजरात के दाहोद जिले के देवगढ़ बरिया की 56 वर्षीय महिला को पिछले 18 वर्षों से एक ट्यूमर था, जिसका वजन 47 किलोग्राम हो गया था, जो उसके वर्तमान शरीर के वजन से सिर्फ दो किलोग्राम कम था। ऑपरेशन प्रक्रिया के दौरान डॉक्टरों द्वारा निकाले गए पेट की त्वचा के ऊतकों और अतिरिक्त त्वचा को जोड़कर कुल निष्कासन का वजन 54 किलोग्राम था।

अपोलो अस्पताल (Apollo Hospital) के डॉ. चिराग देसाई सर्जिकल गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट (surgical gastroenterologist) डॉ. ने कहा कि “हम सर्जरी से पहले मरीज का वजन नहीं कर सकते थे क्योंकि वह सीधे खड़ी नहीं हो सकती थी। लेकिन ऑपरेशन के बाद, उसका वजन 49 किलोग्राम था।” उन्होंने कहा कि "ट्यूमर सहित हटाए गए हिस्से, जिसे डॉक्टरी बोलचाल की भाषा में 'रेट्रोपरिटोनियल लेयोमयोमा' कहा जाता है, का वजन उसके वास्तविक वजन से अधिक था। ऐसा कम ही होता है।"

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पीड़ित महिला के बड़े बेटे ने बताया कि "वह पिछले 18 साल से ट्यूमर के साथ जी रही थी। शुरुआत में यह इतना बड़ा नहीं था। यह उदर क्षेत्र (Abdominal region) में अस्पष्टीकृत वजन बढ़ने के रूप में शुरू हुआ। यह सोचकर कि यह गैस्ट्रिक (gastric) परेशानी के कारण है, उन्होंने पहले कुछ आयुर्वेदिक और एलोपैथिक दवाएं लीं। फिर, 2004 में एक सोनोग्राफी में पता चला कि यह एक बैनाइन ट्यूमर है।"

कोरोना के दौरान दोगुना हुआ ट्यूमर का वजन
उनके बेटे ने बताया कि उसी साल उन्हें सर्जरी के लिए अस्पताल ले जाया गया, लेकिन जब डॉक्टर ने देखा कि ट्यूमर फेफड़े, गुर्दे, आंत आदि सहित सभी आंतरिक अंगों से जुड़ा हुआ है, तो उन्होंने सर्जरी को बहुत जोखिम भरा माना और उसे सिल दिया। उसके बाद से कई डॉक्टरों से सलाह ली गई लेकिन कोई भी ऑपरेशन करने के लिए तैयार नहीं हुआ। इस बीच कोरोना महामारी के दौरान दो साल बहुत परेशानी भरे रहे, क्योंकि ट्यूमर का आकार लगभग दोगुना हो गया था और मेरी मां को लगातार दर्द हो रहा था। वह बिस्तर से नीचे नहीं उतर पा रही थी। इसके बाद हमने इलाज के लिए एक बार फिर डॉक्टरों से सलाह ली।

आखिरकार, परिवार ने अपोलो अस्पताल से संपर्क किया, जहां डॉक्टरों ने पूरी तरह से मूल्यांकन के बाद 27 जनवरी को सर्जरी करने का फैसला किया। पोस्ट - ऑपरेटिव देखभाल और पुनर्वास के बाद महिला को सोमवार को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

डॉ. देसाई ने बताया कि वास्तव में यह सर्जरी बेहद खतरनाक थी। इससे उसके सभी आंतरिक अंग प्रभावित हुए थे। पेट की त्वचा में ट्यूमर के बढ़ने के कारण हृदय, फेफड़े, गुर्दे और गर्भाशय जैसे अंगों की स्थिति बदल गई थी। रक्त वाहिकाओं के कसने के कारण रक्तचाप में वृद्धि हो गई थी। इसलिए, ट्यूमर को हटाने से रक्तचाप में अचानक गिरावट का खतरा था। लेकिन विशेष दवा देकर ऑपरेशन सफलतापूर्वक पूरा किया गया। करीब चार घंटे तक चले इस ऑपरेशन में चार सर्जन समेत आठ डॉक्टरों की टीम शामिल थीं।

टीम का हिस्सा रहे ऑन्को-सर्जन नितिन सिंघल ने कहा, "प्रजनन आयु वर्ग की कई महिलाओं में फाइब्रॉएड आम है, लेकिन शायद ही कभी यह इतना बड़ा हो जाता है।" टीम में एनेस्थेटिस्ट अंकित चौहान, जनरल सर्जन स्वाति उपाध्याय और क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट जय कोठारी शामिल थे।

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