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अब गोरखपुर के मरीज गोरखपुर में ही ठीक होते हैं: डॉ. आर.एन. सिंह

बच्चे ही देश का भविष्य है। यही कल के नेहरू या मोदी होंगे। मैं तो अपने करियर की शुरुआत से ही बच्चों की सलामती और बेहतरी के लिए निरंतर सत्ता से भी संघर्ष करता रहा हूं। वह चाहे स्तनपान संवर्धन समिति के प्लेटफार्म से हो, इंसेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान हो,  2006 का गोरखपुर में पीलिया (जांडिस आउटब्रेक) हो, सार्स के लिए के लिए इंडो नेपाल बॉर्डर पर चेक पोस्ट आइसोलेशन वार्ड हो, डेंगू के लिए ड्रोन से फागिंग, कोरोना काल में आक्सीजन कंसंट्रेटर, मास्क, इंडो नेपाल बॉर्डर पर चेकपोस्ट, मदर्स मिल्क बैंक की माग हो।

आनंद सिंह
December 07 2025 Updated: December 26 2025 16:29
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अब गोरखपुर के मरीज गोरखपुर में ही ठीक होते हैं: डॉ. आर.एन. सिंह डॉ. आर.एन. सिंह

गोरखपुर। उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर बहुत कुछ बोला-लिखा जाता रहा है। खबरें सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों का मिश्रण होती हैं। असल में उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था कैसी है? इस सिस्टम को समझने के लिए हमारे पास 50 साल से मेडिकल प्रैक्टिस करने वाले गोरखपुर के बच्चों के चिकित्सक डॉ. आर.एन. सिंह से शानदार कोई हो नहीं सकते। डॉ. सिंह ने गोरखपुर में बहुत कुछ देखा। बच्चों को मरते देखा, जीते देखा। कई बार खुद को असहाय महसूस किया। कई बार बच्चों को बचाने के लिए अपना सर्वस्व लगा दिया। वह प्रैक्टिस तो कर ही रहे हैं, सामाजिक कार्यों में भी लगे रहते हैं। वह मिशन सेव इन इंडिया के संयोजक हैं, स्तनपान संवर्धन समिति के अध्यक्ष हैं, इन्सेफेलाइटिस उन्मूल अभियान के चीफ कैंपेनर हैं। इन सबसे इतर डॉ. सिंह का सबसे बड़ा परिचय यह है कि वह मुखर होकर बोलते हैं। उनसे स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर बातचीत के प्रमुख अंशः-

सवाल- गोरखपुर में उपलब्ध मेडिकल सुविधाओं को आप किस नजरिये से देखते हैं, जबकि अभी वहां एम्स भी काम करने लगा है?

जवाब- गोरखपुर ने विगत पांच से सात वर्षों में स्वास्थ्य के क्षेत्र में बहुत तरक्की किया है। दो-दो मेडिकल कॉलेज, एम्स और आयुर्वैदिक विश्वविद्यालय की सुविधाओं से लैस गोरखपुर में अब पूर्वांचल, बिहार, नेपाल के गंभीर रोगियों का इलाज संभव हो गया है। अब लोगों इलाज के लिए लखनऊ, बनारस दिल्ली कम जाना पड़ता है।

सवाल- मेडिकल के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश की स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में कैसी है?

जवाब- मेडिकल के क्षेत्र में सुविधाएं उत्तर प्रदेश में देश के कई राज्यों से बेहतर हैं। हर जिले में मेडिकल कॉलेज है। यह शायद ही किसी अन्य प्रदेश में हो। प्रदेश को दो-दो एम्स का भी गौरव प्राप्त है। प्राथमिक और सामुदायिक चिकित्सालयों पर सेवाएं बेहतर हैं।

सवाल- बेबी फ्रेंडली स्टेट से आपका तात्पर्य क्या है और आप क्यों चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश बेबी फ्रेंडली स्टेट बने?

जवाब- बेबी फ्रेंडली परियोजना विश्व स्वास्थ संगठन और यूनिसेफ की एक वैश्विक पहल है। इसका मूल उद्देश्य नवजात और शिशु के लिए संपूर्ण स्तनपान को संवर्धित और सुरक्षित करके उसे फूड सिक्योरिटी प्रदान करना है। अमूमन अस्पताल और क्लिनिक ही बेबी फ्रेंडली घोषित हुआ करते हैं। 

मैंने वर्ष 2001 से 2004 तक जिले को बेबी फ्रेंडली बनाने की शुरुआत की थी। महराजगंज और गोरखपुर जिले  में सतत प्रयास किया। अंततः इस परियोजना के सहमति प्रपत्र पर दोनों जिलों के जिलाधिकारी, मुख्य चिकत्साधिकारी,  नेशनल चीफ ट्रेनर आफ ब्रेस्ट फीडिंग डा. के पी कुशवाहा और हमारे हस्ताक्षर भी हो गये, पर दोनों जिले बेबी फ्रेडली नहीं बन पाये। इस बेबी फ्रेंडली बनाने की मुहिम को भले ही शिकस्त का सामना करना पडा लेकिन यही बेबी फ्रेडली स्टेट आंदोलन की पुख्ता नींव है। विगत दो वर्षों से मेरी कोशिस है की उत्तर प्रदेश को बेबी फ्रेंडली स्टेट बनवाने के लिए पुरजोर संघर्ष किया जाए। उत्तर प्रदेश के बेबी फ्रेंडली स्टेट घोषित होने से बहुत सारे लाभ हैं। सबसे पहले इससे शिशु मृत्यु दर में कमी आएगी, खासकर नियोनाटल मोर्टालिटी रेट काफी कम हो जाएगा। फिर शिशु के अतिरिक्त मां को भी इससे कई लाभ होंगे। जैसे ब्रेस्ट कैंसर, गर्भाशय कैंसर और प्रसवोपरांत रक्तस्राव में काफी कमी आयेगी जिससे मातृ मृत्यु मृत्यु दर में काफी कमी आएगी। इसके साथ ही बच्चों की कई घातक बीमारियां जैसे डायरिया, निमोनिया, सेप्सिस और कुपोषण में भी भारी कमी आएगी और बाल मृत्यु दर में काफी कमी होगी। इसके अतिरिक्त संपूर्ण स्तनपान पर सुपोषित बच्चे शारीरिक, बौद्धिक और सामाजिक रुप से मजबूत युवा होंगे जो विकसित उत्तर प्रदेश- 2047 के सिक्स ट्रिलियन इकोनोमी को मजबूत कंधे प्रदान करेंगे। बेबी फ्रेंडली स्टेट यूपी के मिशन-2030 के निओनेटल मार्टैलिटी रेट को बारह प्रति हजार और अंडरफाइव मार्टैलिटी को पचीस प्रति हजार तक कम करने में भी बेबी फ्रेंडली स्टेट ठोस मदद करेगा। इतना ही नहीं, इससे प्रदेश को प्रति वर्ष पचीस हजार करोड़ का आर्थिक लाभ भी होगा। यह उस बचत के रुप में होगा जो अभी शिशुओं की गंभीर बीमारियों में आइसीयू और क्रिटिकल केयर में खर्च होता है। 

सवाल- क्या पूर्वांचल में कहीं मदर्स मिल्क बैंक की स्थापना हो पाई?

जवाब- बहुत पहले 21 सितंबर, 1999 में मैंने नौतनवा में पहली बार जब मिल्क बैंक की मांग उठाई तो लोग मुझ पर हंस रहे थे। मैं लगातार प्रयास करता रहा। अब दो वर्ष पहले, 2023 में मदर्स मिल्क बैंक गोरखपुर मेडिकल कालेज में यह स्थापित हो गया। हमारा सुझाव/मांग है कि पहले इसे जिला स्तर पर फिर हर ब्लाक स्तर पर स्थापित किया जाय। यह बैंक प्री मैच्योर, कम वजन वाले बच्चों और कई बार मां की बीमारी आदि में भी शिशु को मानव मिल्क उपलब्ध करायेंगे। हम सरकार और गैर सरकारी संस्थाओं से इसके लिए अनुरोध करते हैं।

सवाल- यह माना जाता है कि यूपी से इन्सेफेलाइटिस का खात्मा हो गया। क्या आप इस तथ्य से सहमत हैं?

जवाब- यूपी, खासकर पूर्वांचल की चार दशक की एनुअल सीरियल किलर इन्सेफेलाइटिस पर विगत चार-पांच वर्षों से प्रभावी नियंत्रण हो गया है। इक्का-दुक्का को छोड दें तो 95 फीसदी तक महामारी नियंत्रित हो गई है। इसके लिए इन्सेफेलाइटिस उन्मूलन अभियन ने पंद्रह वर्षों तक खून-पसीना बहाया है। इसके प्रयासों से इंसेफ्लाइटिस का नेशनल प्रोग्राम बना। पहली बार मास स्केल पर साठ लाख टीके लगे। चार हजार करोड रूपये आये। इसे बारहवीं पंचवर्षीय योजना में शामिल किया गया। पूरे अभियान को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का 2005 से ही अभूतपूर्व सहयोग मिलता रहा। उनके राजनीतिक इच्छाशक्ति और बीस साल के संघर्ष के लिये पूर्वांचल सदा ऋणि रहेगा। मुख्यमंत्री पद संभालते ही उन्होने इंसेफ्लाइटिस को बहुत संजीदगी से खत्म करने का प्रयास किया। अब तो इंसेफ्लाइटिस नियंत्रित है।

यहां यह कहना चाहूंगा जिस नीप अभियान ने सात जिलों में संघर्ष करके बनवा तो लिया पर उसका जमीनी उपयोग देश के सत्रह प्रभावित प्रदेशों में हो जहां इंसेफ्लाइटिस अभी भी मौजूद है। सिर्फ यूपी से इसका नियंत्रण हमारे अभियान का मकसद नहीं था। हम लोग इंसेफ्लाइटिस का उन्मूलन पूरे देश से करना चाहते थे, उसके लिए वचनबद्ध हैं। 

सवाल- मेडिकल के क्षेत्र में गोरखपुर में जो विकास हो रहा है, आयुष विश्वविद्यालय खुल चुका है, आम लोगों को इसका फायदा कबसे मिलना शुरु होगा?*

जवाब- मेडिकल क्षेत्र में गोरखपुर में हो रहे विकास का लाभ यहां के बाशिंदों को एक-दो वर्ष पूर्व से ही मिलना प्रारंभ हो गया है। गोरखपुर में एम्स बन गया, एक मेडिकल कॉलेज और खुल गया, आयुष विश्वविद्यालय भी बन गया। कॉरपोरेट हॉस्पिटल भी यहां पर अपनी शाखाएं स्थापित कर रहे हैं। रीजेंसी हॉस्पिटल यहां आ गया है। मेदांता और अपोलो भी इस विषय पर विचार कर रहे हैं। इन सब सुविधाओं के हो जाने से पूर्वी उत्तरप्रदेश, बिहार, नेपाल की लगभग 7 करोड़ की आबादी को अब दिल्ली-लखनऊ जाने की ज़रूरत कम पड़ रही है। गंभीर और जटिल बीमारियों का इलाज अब यहीं हो सकता है।

सवाल- बतौर शिशु रोग विशेषज्ञ, आपको सेवा करते 50 साल का लंबा अनुभव हो गया। बच्चों की दुनिया कैसी है? आपने क्या महसूस किया है?*

जवाब- एक वाक्य में कह सकता हूं कि "I love children, I live for them and can die for them" बच्चे ही देश का भविष्य है। यही कल के नेहरू या मोदी होंगे। मैं तो अपने करियर की शुरुआत से ही बच्चों की सलामती और बेहतरी के लिए निरंतर सत्ता से भी संघर्ष करता रहा हूं। वह चाहे स्तनपान संवर्धन समिति के प्लेटफार्म से हो, इंसेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान हो,  2006 का गोरखपुर में पीलिया (जांडिस आउटब्रेक) हो, सार्स के लिए के लिए इंडो नेपाल बॉर्डर पर चेक पोस्ट आइसोलेशन वार्ड हो, डेंगू के लिए ड्रोन से फागिंग, कोरोना काल में आक्सीजन कंसंट्रेटर, मास्क, इंडो नेपाल बॉर्डर पर चेकपोस्ट, मदर्स मिल्क बैंक की माग हो। वर्तमान में मेरा प्रयास है कि उत्तर प्रदेश एक बेबी फ्रेंडली स्टेट घोषित हो, जो हर शिशु को पोषण का अधिकार फूड सिक्योरिटी प्रदान करेगा। इससे प्रदेश के इंफैट मार्टैलिटी रेट और मैटर्नल मार्टैलिटी रेट में भारी कमी आयेगी।


सवाल- उत्तर प्रदेश के चिकित्सकों में मेडिकल जनरल पढ़ने की आदत है या नहीं?*

जवाब- इंस्टीट्यूशंस, जैसे मेडिकल कॉलेज के टीचर्स, विद्यार्थी व जुड़े चिकित्सक जरनल्स में रुचि रखते हैं, पर सरकारी सेवाओं के चिकित्सक और गैर सरकारी चिकित्सक प्राइवेट प्रैक्टिशनर आदि की इसमें बहुत कम रुचि है।

सवाल- छोटी-मोटी बीमारियों के इलाज के लिए भी लोगों को लखनऊ-दिल्ली के चक्कर लगाने पड़ते हैं। ऐसा क्या किया जाए कि यहां के मरीज यहीं ठीक हो जाएं?*

जवाब- अब गोरखपुर चिकित्सकीय सुविधाओं के मामले में, चिकित्सकों और सुपर स्पेशियलिटी के मामले में पूरी तरह संपन्न हैं। काफी लोग अपनी इलाज संबंधी जरुरतें यहीं पूरी कर रहे हैं। फिर भी अभी दिल्ली और लखनऊ का तिलिस्म बाकी है। सभी वर्ग के रोगियों को चिकित्सकीय सुविधा गोरखपुर में ही मिले, इसके लिए सेवायें सर्वसुलभ और विश्वसनीय बनानी होंगी। एक विश्वास कायम करना होगा। जहां तक पलायन की बात है तो यह लखनऊ से दिल्ली और दिल्ली से विदेशों तक चलता रहता है और गोरखपुर से भी होगा।

सवाल- लगातार महंगी हो रही चिकित्सा व्यवस्था को लेकर आप क्या सोचते हैं? क्या भारत में चिकित्सा मुफ्त में हो, ऐसा कोई रोडमैप है?*

जवाब- रोटी, कपडा और मकान के बाद इलाज हर ब्यक्ति के लिये सबसे बडी आवश्यकता है। सरकार रोटी की ब्यवस्था के लिए 80 करोड लोगों को फ्री में राशन दे रही है। इलाज के लिए आयुष्मान जैसी विश्व की सबसे बडी योजना चल रही है। अब सत्तर साल से ऊपर के लोगों को भी पांच लाख का स्वास्थ्य बीमा दिया जा रहा है। जहां तक इलाज के महंगा होने की बात है तो इसे सबकी पहुंच के भीतर होना चाहिये। चिकित्सा ब्यवस्था ब्यापार न बने, सिर्फ सेवा हो। यह हम सिर्फ कामना कर सकते हैं।


यहां एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि उत्तर प्रदेश सरकार ने मिशन 2030 में प्रदेश की 50 फीसदी आबादी का हेल्थ इंश्योरेंश का लक्ष्य रखा है। इसका हम तहे दिल से स्वागत करते हैं। मेरा मानना है कि तमाम विकसित देशों की तरह हमारे देश में भी सभी का स्वास्थ्य बीमा होना चाहिये। सौ प्रतिशत। इससे कम नहीं।

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