











































डॉ आर. एन. सिंह, चीफ कैंपेनर, इंसेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान, गोरखपुर
डॉक्टर आरएन सिंह इंसेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान के चीफ कैंपनर हैं और मेडिकल फील्ड में उन्हें 50 साल हो चुके हैं। इंसेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान को इन्होंने काफी गति दी और इसके लिए खून से खत भी लिखा। अभी डॉक्टर सिंह बढ़े शिशु मृत्यु दर को लेकर चर्चा में हैं। भारत में शिशु मृत्यु दर 1000 में 23 है तो उत्तर प्रदेश में यह 38 के करीब है। यूपी में योगी आदित्यनाथ की 8 साल से चल रही सरकार में हेल्थ सेक्टर में क्या काम हुए हैं, क्या होने चाहिए, इन्हीं मुद्दों पर हेल्थ जागरण ने डॉ. आर.एन. सिंह से विस्तृत बात की। प्रमुख अंशः-
सवालः आपने शिशु जन्म-मृत्यु दर को लेकर कुछ पॉइंट्स उठाए थे। यह क्या है?
जवाबः शिशु मृत्यु दर (मोर्टालिटी रेट) किसी भी देश के हेल्थ स्टेटस का सबसे बड़ा इंडिकेटर है। हमने बहुत तरक्की की है और शिशु मृत्यु दर में आजादी के बाद भारी कमी भी लाए, लेकिन अगर गौर से देखें तो हमारे देश का शिशु मृत्यु दर का आंकड़ा है वह प्रति हजार बच्चे में से 23 बच्चों की मौत हो जाती है। फिलहाल हमने जापान को अर्थव्यवस्था में पछाड़ दिया है और हम चौथी अर्थव्यवस्था बन गए हैं लेकिन हमारा एक सवाल है क्या उसके पास भी हम आते हैं... तो मेरा कहना है बिल्कुल नहीं। यहां जापान का जो आंकड़ा है वह है प्रति हजार बच्चे पर 1.5 बच्चा मृत्यु दर है। अब आप सोचिए कहां डेढ़ और कहां 23 बच्चे। जापान में भारत की तुलना में 15 गुना कम बच्चे मरते हैं। इसी तरह अगर हम अंडर 5 मोर्टालिटी की बात करें तो वह भी जापान से 10 गुना अधिक है। आप तीसरी अर्थव्यवस्था बनने जा रहे हैं लेकिन इन दोनों दरों को कम करने के लिए ग्रासरुट पर काम करना होगा तभी किसी आर्थिक संपन्नता का मुकाम हासिल कर सकते हैं। किसी भी देश का सोशल डेवलपमेंट और इकोनामिक डेवलपमेंट दिखाता है कि आप कितना सोशली स्ट्रांग हैं। सिर्फ़ एक आंकड़ा हासिल कर लेने से कोई संपन्न नहीं हो सकता।
सवालः उत्तर प्रदेश में इस रेट को आप कैसे जज करते हैं?
जवाबःआपने अच्छा प्रश्न उठाया। उत्तर प्रदेश कई मामलों में उत्तम प्रदेश है। सबसे बड़ी बात यह है कि इन आंकड़ों की बात आती है तो हम यहां पिछड़ जाते हैं। मतलब यह कि हम अगर आंकड़ों पर गौर करें और सारे प्रदेशों का अगर आंकड़ा सामने रखें तो आप पाएंगे कि नीचे से हम दूसरे स्थान पर हैं। पहले नंबर पर मध्य प्रदेश है। दूसरे नंबर पर यूपी है। यह ठीक है कि पिछले 10-15 वर्षों में हमने बहुत सफलता प्राप्त की है, लेकिन अभी भी जो हमारा टारगेट है, उससे हम बहुत पीछे हैं। यूपी में 1000 में से कहीं 30 तो कहीं 38 बच्चे मृत्यु को प्राप्त होते हैं। 1000 में 38 बच्चों की मौत यकीनन बहुत ज्यादा है। यूपी देश का सबसे बड़ा प्रदेश है आबादी के मामले में। अपने आप में लगभग एक अमेरिका है। इसी तरह अगर आप देखें तो हमारी ही धरती पर लॉर्ड रामा, लॉर्ड कृष्णा और लॉर्ड शिवा ने जन्म लिया, क्रिया-कलाप किया। इसके बावजूद भी अगर यहां पर यह ज्यादा है और शिशु मृत्यु दर का ज्यादा होना कतई बर्दाश्त नहीं है। आजादी के बाद से अगर आप आंकड़ों को देखना शुरू करें तो 85 प्रतिशत प्रधानमंत्री यूपी से ही हुए। यूपी से शिशु मृत्यु दर कम करने के लिए व्यापक स्वास्थ्य कार्यक्रम बनाने होंगे। इसमें समाज को आगे आना होगा। सिर्फ सरकारी कार्यक्रमों की बदौलत रहेंगे तो बहुत पीछे रह जाएंगे।

सवालः आपने इंसेफेलाइटिस पर भी काफी काम किया और इंसेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान के चीफ कैंपनर भी हैं। 2017 से लेकर के 2025 तक की बात करें तो ऐसा दावा किया जाता है कि इंसेफेलाइटिस उत्तर प्रदेश, खासकर पूर्वांचल के जो 7 जिले हैं वहां अब खत्म हो गया। केस अभी भी आ रहे हैं। सच्चाई क्या है?
जवाबः देखिए, कमी तो बहुत आई है इसमें कोई शक नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि केस नहीं आ रहे हैं। सरकारी व्यवस्था और मीडिया रिपोर्ट नहीं करती है तो जाहिर सी बात है कि आंकड़े सामने नहीं आ रहे। लेकिन यह मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि जहां तक कमी की बात है तो 90-95 प्रतिशत तक केसों में कमी आई है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, महराजगंज, देवकिया, कुशीनगर, बस्ती, संत कबीर नगर और सिद्धार्थनगर में केस कम हुए हैं, पूरी तरह खत्म नहीं हुए। अभी भी बिहार, असम और वेस्ट बंगाल में केस आ रहे हैं। भारी संख्या में आ रहे हैं। यह डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट है। हिंदुस्तान के 24 प्रदेशों में यह बीमारी अभी व्याप्त है। हाल ही में गुजरात में चांदीपुर वायरस के कारण दो-दो-चार-चार घंटों में बच्चे मरे हैं। हम लोगों ने इतनी मेहनत की, 10 साल की, जमीन पर संघर्ष किया, नेशनल प्रोग्राम बनवाया, अगर उसको वाकई अगर जमीनी स्तर पर लागू किया गया होता तो आज देश से इंसेफेलाइटिस का उन्मूलन हो गया होता।
सवालः बरसात का मौसम आ गया है। इन्सेफेलाइटिस से बचने के लिए लोग क्या करें...
जवाबः मच्छरजनित बीमारियों के लिए लोगों में थोड़ी सी जानकारी होनी चाहिए। मच्छर से बचाव के लिए दरवाजे खिड़की पर जाली लगाएं। रात में मच्छरदानी का प्रयोग करें। बच्चों को पूरे कपड़े पहनाएं। सरकार और नगर निकाय को लगातार फॉगिंग करते रहना चाहिए। बरसात में मच्छर के जो लार्वा पनपते हैं, जिससे डेंगू का खतरा हर जगह बना रहता है, उसे पनपने न दें। अभी से ही प्रिकॉशन लेना शुरू कर दिया जाए। होलिया मॉडल को अपनाएं। उसमें 10 बिंदु थे। इन्हीं 10 बिंदुओं को लेकर प्रदेश सरकार काम कर रही है।
सवालः 2017 में योगी जी मुख्यमंत्री बने और अभी भी मुख्यमंत्री वही हैं। इन 8 वर्षों में हेल्थ सेक्टर में उन्होंने क्या खास किया... ए सोशल एक्टिविस्ट के रुप में, एक चिकित्सक के रुप में आप उनके कार्यों को कैसे रेट करेंगे...?

जवाबः योगी आदित्यनाथ जी काफी पहले से काम करते रहे हैं। इस मुद्दे पर संसद में भी बोलते रहे हैं और उन्होंने अच्छा काम किया है। मैं एक कार्यकर्ता हूं, मैं एक सोशल एक्टिविस्ट हूं, मैं डिमांड कर सकता हूं। देना या न देना सरकार का काम है। हमारी मांग पर वायरस लैब बनी। अमेरिका की टीम यहां आई थी। उसके बाद से दशा सुधरी है। यह तो यूपीए सरकार ने 2011-12 में किया था। हमारे कहने पर उसने नेशनल प्रोग्राम भी बना दिया और 4000 करोड़ भी दिया उस मद में। हमारी मांग पर इसको 12वीं पंचवर्षीय योजना में मांग लिया। मैं चूंकि एक एक्टिविस्ट हूं तो अपनी डिमांड उठा सकता हूं। मेरे पास संसाधन तो नहीं थे कि मैं 4000 करोड़ रुपए दे देता। मैं डिमांड कर सकता था। उसको बखूबी योगी आदित्यनाथ जी ने संसद में उठाया। उसके साथ-साथ यहां पर जो सबसे बड़ा जो काम हुआ वो दस्तक उन्होंने शुरू किया। दस्तक के माध्यम से घर-घर जाकर काम हुए और काफी बदलाव आया। जो चीज हमने रेखांकित करके 10 सूत्रों के माध्यम से सरकार के सामने रखी थी, उन सब पर असली फायदा तब हुआ जब योगी आदित्यनाथ जी आये। यह स्पष्ट कहूंगा कि अगर और अच्छे काम किए जाएं तो स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो सबसे बड़ा इंडिकेटर है शिशु मृत्यु दर का, उसको कम किया जा सकता है। मोर्टालिटी रेट को अगर हम कम नहीं कर पाते हैं तो किस मुंह से कहेंगे कि उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश है?







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