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यूरोलॉजिकल केयर में मैक्स हॉस्पिटल की नई उपलब्धि, उच्च-जोखिम वाले मरीजों पर सफलतापूर्वक की गई

रेज़ूम थेरेपी उन पुरुषों के लिए गेम-चेंजर है जो बढ़े हुए प्रोस्टेट की वजह से पेशाब की समस्या झेल रहे हैं। रेज़ूम एक सेफ और इफेक्टिव ऑप्शन है, जो जीवन की क्वालिटी को बेहतर बनाता है और सेक्सुअल कैपेसिटी पर कोई असर नहीं डालता।

हुज़ैफ़ा अबरार
August 31 2025 Updated: August 31 2025 19:56
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यूरोलॉजिकल केयर में मैक्स हॉस्पिटल की नई उपलब्धि, उच्च-जोखिम वाले मरीजों पर सफलतापूर्वक की गई बेनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लेसिया से जूझ रहे मरीज़

लखनऊ।  मिनिमली इनवेसिव यूरोलॉजिकल केयर (कम आक्रामक मूत्र रोग उपचार) की दिशा में एक अग्रणी कदम उठाते हुए, मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, लखनऊ, के डॉक्टरों ने दो उच्च-जोखिम वाले मरीजों पर सफलतापूर्वक रेज़ूम वॉटर वेपर थेरेपी की। यह उपलब्धि बेनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लेसिया (बीपीएच), यानी बढ़े हुए प्रोस्टेट से जूझ रहे पुरुषों के लिए एक नई उम्मीद लेकर आई है।

रेज़ूम थेरेपी, एक यूएस एफडीए-अनुमोदित प्रक्रिया है, जिसमें वॉटर वेपर में मौजूद प्राकृतिक ऊर्जा का उपयोग कर अतिरिक्त प्रोस्टेट ऊतक को सिकोड़ दिया जाता है। इससे पेशाब से जुड़ी तकलीफ़ों से राहत मिलती है, और इसमें किसी प्रकार की चीरा या कट की ज़रूरत नहीं पड़ती। ट्रेडिशनल सर्जरी की तुलना में यह एक डे-केयर प्रक्रिया है, जिसमें जनरल या स्पाइनल एनेस्थीसिया की आवश्यकता नहीं होती और रोगी को जल्दी स्वास्थ्य लाभ मिलता है, साथ ही इसके साइड-इफेक्ट भी बेहद कम हैं।

इस उपलब्धि पर डॉ. राहुल यादव, निदेशक एवं प्रमुख यूरोलॉजी, एंड्रोलॉजी, किडनी ट्रांसप्लांटेशन और रोबोटिक यूरो-ऑन्कोलॉजी, मैक्स हॉस्पिटल, लखनऊ ने कहा, रेज़ूम थेरेपी उन पुरुषों के लिए गेम-चेंजर है जो बढ़े हुए प्रोस्टेट की वजह से पेशाब की समस्या झेल रहे हैं। रेज़ूम एक सेफ और इफेक्टिव ऑप्शन है, जो जीवन की क्वालिटी को बेहतर बनाता है और सेक्सुअल कैपेसिटी पर कोई असर नहीं डालता। हमें गर्व है कि हम लखनऊ में अपने मरीजों को यह मॉडर्न टेक्नोलॉजी उपलब्ध करा पा रहे हैं।

बीपीएच एक आम प्रॉब्लम है, जो 50 वर्ष से अधिक उम्र के पुरुषों में ज़्यादा पाई जाती है। इस कंडीशन में मरीजों को बार-बार पेशाब की इच्छा, वीक यूरिन फ्लो, ब्लैडर के अधूरे खाली होने की समस्या और स्लीप डिस्टर्बेंस जैसी शिकायतें होती हैं। ट्रेडिशनल ट्रीटमेंट में लाइफ-लॉन्ग मेडिकेशन्स पर निर्भर रहना पड़ता है या फिर एनेस्थीसिया वाली सर्जरी करनी पड़ती है, जिन दोनों की अपनी लिमिटेशन्स हैं। रेज़ूम थेरेपी इस गैप को ब्रिज करती है, क्योंकि यह इफेक्टिवनेस के साथ कन्वीनियंस भी प्रोवाइड करती है।


 
पहला केस कन्हैया लाल 57 वर्ष, लखीमपुर का था, जो पिछले एक साल से यूरिनरी रिटेंशन के चलते कैथेटर के सहारे थे। उनकी सीवियर कार्डियक प्रॉब्लम और डायबिटीज़ के कारण ट्रेडिशनल सर्जरी पॉसिबल नहीं थी। ऐसे में मैक्स हॉस्पिटल की टीम ने रेज़ूम थेरेपी का निर्णय लिया।

इस पर डॉ. यादव ने बताया कि लोकल एनेस्थीसिया के तहत बिना किसी चीरे या ब्लीडिंग के की गई। इस थेरेपी ने तीन हफ्तों के भीतर उनकी नेचुरल यूरिनेशन कैपेसिटी लौटा दी और उनके क्वालिटी ऑफ लाइफ में रिमार्केबल इम्प्रूवमेंट हुआ।

दूसरा केस और भी चैलेंजिंग था। नकुल मिस्त्री 84 वर्ष, लखनऊ पिछले छह साल से यूरिनरी रिटेंशन की वजह से कैथेटर पर निर्भर थे। उनकी उम्र के साथ-साथ मल्टिपल को-मॉरबिडिटीज़ और सीवियर कार्डियक डिज़ीज़ होने के कारण उन्हें कई सेंटर्स पर सर्जरी के लिए मना कर दिया गया था। लेकिन मैक्स हॉस्पिटल, लखनऊ में रेज़ूम थेरेपी लोकल एनेस्थीसिया के तहत सफलतापूर्वक की गई और तीन हफ्तों के भीतर उनका कैथेटर हटा दिया गया।

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