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अपोलोमेडिक्स में पहली बार एक रोबोटिक सर्जरी में दो अलग किडनी समस्याओं का इलाज 

डीटीपीए जांच में पता चला कि दाईं किडनी 40 प्रतिशत और बाईं किडनी 60 प्रतिशत काम कर रही थी। डॉक्टरों के सामने चुनौती यह थी कि बेहतर काम कर रही बाईं किडनी में भी गंभीर रिफ्लक्स के साथ बार-बार संक्रमण का इतिहास था जबकि दाईं किडनी में पेशाब के बहाव की रुकावट थी। दोनों किडनियों की समस्याएं अलग-अलग थीं और उनके इलाज के लिए दो अलग-अलग सर्जिकल प्रक्रियाओं की जरूरत थी। इसलिए डॉक्टरों ने दोनों का इलाज एक ही सर्जिकल सत्र में करने का निर्णय लिया। रोबोटिक सर्जरी के दौरान सबसे पहले दाईं किडनी की रुकावट दूर करने के लिए एंडरसन-हाइन्स पाइलोप्लास्टी की गई।

हुज़ैफ़ा अबरार
November 03 2026 Updated: November 03 2026 17:30
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अपोलोमेडिक्स में पहली बार एक रोबोटिक सर्जरी में दो अलग किडनी समस्याओं का इलाज  Dr. Givi Gaurav and Dr. Mayank Soma, MD & CEO, Apollomedics

लखनऊ।अपोलोमेडिक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल लखनऊ की यूरोलॉजी टीम ने भारत में पहली बार एक ही रोबोटिक सर्जिकल सत्र में सात साल की बच्ची की दोनों किडनियों से जुड़ी दो अलग-अलग जटिल जन्मजात समस्याओं का सफलतापूर्वक इलाज करने की उपलब्धि हासिल की है। बच्ची की दाईं किडनी में पेल्वियूरेटेरिक जंक्शन यानी पीयूजे ऑब्स्ट्रक्शन था। इस समस्या में किडनी से पेशाब के बहाव में रुकावट आती है। वहीं बाईं किडनी में ग्रेड-फोर वेसिकोयूरेटेरिक रिफ्लक्स यानी वीयूआर की समस्या थी। इसमें पेशाब मूत्राशय से वापस किडनी की ओर जाने लगता है।

सर्जरी डॉ. गिवी गौरव एसोसिएट डायरेक्टर एवं यूनिट हेड यूरोलॉजी यूरो-ऑन्कोलॉजी एवं किडनी ट्रांसप्लांट के नेतृत्व में की गई।बच्ची को दो से तीन साल की उम्र से बार-बार यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन यानी यूटीआई की शिकायत थी। अलग-अलग जगहों पर इलाज कराने के बावजूद संक्रमण बार-बार हो रहा था। बाद में बच्ची को पेट के दाईं ओर और फ्लैंक यानी कमर के पास दर्द के साथ मतली की शिकायत हुई जिसके बाद उसे अपोलोमेडिक्स लाया गया। जांच में दाईं किडनी में पीयूजे ऑब्स्ट्रक्शन के साथ एक लोअर-पोल क्रॉसिंग वेसल पाया गया। इसका मतलब है कि किडनी के निचले हिस्से के पास मौजूद एक रक्त वाहिका पेशाब के बहाव में रुकावट पैदा कर रही थी। दूसरी ओर एमसीयूजी जांच में बाईं किडनी में ग्रेड-फोर वीआर की पुष्टि हुई। यह पेशाब के वापस किडनी की ओर जाने की गंभीर समस्या है।

डीटीपीए जांच में पता चला कि दाईं किडनी 40 प्रतिशत और बाईं किडनी 60 प्रतिशत काम कर रही थी। डॉक्टरों के सामने चुनौती यह थी कि बेहतर काम कर रही बाईं किडनी में भी गंभीर रिफ्लक्स के साथ बार-बार संक्रमण का इतिहास था जबकि दाईं किडनी में पेशाब के बहाव की रुकावट थी। दोनों किडनियों की समस्याएं अलग-अलग थीं और उनके इलाज के लिए दो अलग-अलग सर्जिकल प्रक्रियाओं की जरूरत थी। इसलिए डॉक्टरों ने दोनों का इलाज एक ही सर्जिकल सत्र में करने का निर्णय लिया। रोबोटिक सर्जरी के दौरान सबसे पहले दाईं किडनी की रुकावट दूर करने के लिए एंडरसन-हाइन्स पाइलोप्लास्टी की गई।

इस प्रक्रिया में रुकावट वाले पीयूजे हिस्से को अलग करके उसका पुनर्निर्माण किया गया, ताकि पेशाब का बहाव सामान्य हो सके। सर्जरी के दौरान वहां मौजूद क्रॉसिंग वेसल को सुरक्षित रखा गया। साथ ही, किडनी के उस हिस्से को, जहां पेशाब इकट्ठा होता है, रक्त वाहिका के आगे की ओर स्थानांतरित किया गया। इससे रुकावट को ठीक करने में मदद मिली। इसके बाद रोबोटिक सिस्टम को अनडॉक किया और बच्ची की सर्जिकल पोजिशन बदली गई ताकि दूसरी किडनी का इलाज किया जा सके। इस प्रक्रिया के लिए पेट में नया पोर्ट बनाने की जरूरत नहीं पड़ी। पहले से मौजूद लेफ्ट इलियक फोसा यानी पेट के निचले बाईं ओर मौजूद पोर्ट का आकार पांच मिमी से बढ़ाकर आठ मिमी किया। इसके बाद रोबोटिक सिस्टम को दोबारा डॉक किया गया।

दूसरी प्रक्रिया में बाईं किडनी की समस्या ठीक करने के लिए एक्स्ट्रावेसिकल यूरेटेरिक रीइम्प्लांटेशन किया गया। इसमें मूत्रवाहिनी को मूत्राशय से दोबारा इस तरह जोड़ा जाता है कि पेशाब वापस किडनी की ओर न जा सके। इस प्रक्रिया के जरिए बाईं किडनी में मौजूद ग्रेड-फोर रिफ्लक्स का उपचार किया गया। पूरी सर्जरी पांच पोर्ट साइट्स के जरिए एक ही लगातार रोबोटिक सर्जिकल सत्र में पूरी की गई। किसी अतिरिक्त पोर्ट की जरूरत नहीं पड़ी। प्रक्रिया के बीच रोबोटिक सिस्टम का री-रजिस्ट्रेशन भी नहीं करना पड़ा। सर्जरी का कुल कंसोल टाइम लगभग 323 मिनट रहा, जिसमें 261 मिनट तक सर्जिकल उपकरण सक्रिय रहे। सर्जरी के दौरान लगभग 50 मिलीलीटर खून निकला। प्रक्रिया को ओपन सर्जरी में बदलने की जरूरत नहीं पड़ी और सर्जरी के दौरान कोई जटिलता भी सामने नहीं आई। बच्ची को ऑपरेशन के तीसरे दिन अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

सर्जरी के एक महीने बाद हुए फॉलो-अप में बच्ची को कोई नया यूटीआई नहीं हुआ। ऑपरेशन के बाद की अल्ट्रासोनोग्राफी सामान्य रही। डीटीपीए जांच में भी दाईं किडनी में पेशाब के बहाव की कोई रुकावट नहीं पाई गई। एक महीने के फॉलो-अप पर यूरेटेरिक स्टेंट भी सफलतापूर्वक निकाल दिए गए। स्टेंट छोटी ट्यूब होती हैं, जिन्हें सर्जरी के बाद पेशाब के बहाव को बनाए रखने में मदद के लिए लगाया जाता है। बच्ची की रिकवरी संतोषजनक रही। डॉ. गिवी गौरव ने कहा इस मामले की खास बात केवल यह नहीं थी कि दोनों प्रक्रियाएं रोबोट की मदद से की गईं। बच्ची की दोनों किडनियों में अलग-अलग समस्याएं थीं और उनके लिए दो अलग-अलग रिकंस्ट्रक्टिव प्रक्रियाओं की जरूरत थी। चुनौती यह थी कि दोनों समस्याओं का इलाज एक ही एनेस्थीसिया और एक ही रोबोटिक सर्जिकल सत्र में सुरक्षित तरीके से किया जाए, वह भी पेट में अतिरिक्त सर्जिकल एक्सेस बनाए बिना।

 डॉ. गिवी गौरव ने कहा उपलब्ध प्रकाशित मेडिकल साहित्य में हमें इस विशेष संयोजन का पहले कोई विवरण नहीं मिला। इसमें एक तरफ पीयूजे ऑब्स्ट्रक्शन के लिए रोबोटिक पाइलोप्लास्टी और दूसरी तरफ गंभीर वीआर के लिए उसी समय यूरेटेरिक रीइम्प्लांटेशन किया गया। इसलिए यह क्लिनिकल और तकनीकी दृष्टि से एक असामान्य रोबोटिक रिकंस्ट्रक्शन प्रक्रिया है। यह सर्जरी भारत में अपनी तरह की पहली रोबोटिक रिकंस्ट्रक्टिव प्रक्रिया है। इसमें दोनों किडनियों की अलग-अलग जन्मजात समस्याओं के लिए दो अलग-अलग सर्जिकल प्रक्रियाएं एक ही रोबोटिक सर्जिकल सत्र में पूरी की गईं।

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