











































TB patients
लखनऊ। उत्तर प्रदेश देश में टीबी का सबसे बड़ा बोझ उठाने वाला राज्य है। देश गंभीर लेकिन अक्सर अनदेखी समस्या से जूझ रहा है। मरीजों द्वारा बीच में इलाज छोड़ देना इस लड़ाई में सरकारी प्रयासों का मंद कर देता है। आज सरकार मुफ्त दवा पोषण, आर्थिक सहायता और निगरानी जैसी सुविधाएं दे रही है, फिर भी जमीनी हकीकत यह है कि हर 100 में लगभग 3 मरीज इलाज पूरा नहीं कर पाते। दवा-प्रतिरोधी टीबी (MDR-TB) में यह आंकड़ा 10 से 13 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। उत्तर प्रदेश में हर साल लाखों मरीज टीबी का इलाज शुरू करते हैं। हालिया आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में लगभग 6.9 लाख टीबी मरीज पंजीकृत हैं। ऐसे में यदि 3 प्रतिशत मरीज भी इलाज छोड़ते हैं, तो यह संख्या हजारों में पहुंच जाती है, जो न केवल खुद के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए भी खतरा बन जाती है। टीबी मुख्यतः फेफड़ों को प्रभावित करने वाला गंभीर संक्रामक रोग है। टीबी की पुष्टि के लिए चिकित्सक छाती के एक्स-रे (Chest X-ray), थूक की जांच या सीटी स्कैन करते हैं।
क्यों छोड़ देते हैं मरीज इलाज? टीबी का इलाज लंबी अवधि में कई चुनौतियां सामने आती हैं-- दवाओं के साइड इफेक्ट
काम के लिए पलायन (माइग्रेशन)
सामाजिक कलंक (stigma)—मरीज बीमारी छिपाते हैं
परिवार और सामाजिक समर्थन की कमी
अधूरा इलाज: एक खामोश खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार जो मरीज इलाज बीच में छोड़ देते हैं वे silent transmitters बन जाते हैं—यानी वे अनजाने में बीमारी फैलाते रहते हैं। इतना ही नहीं अधूरा इलाज दवा-प्रतिरोधी टीबी (MDR-TB) को जन्म देता है, जिसका इलाज और अधिक लंबा, महंगा और जटिल होता है।
राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम (NTEP) के तहत सरकार
मुफ्त जांच और दवा
₹1000 प्रति माह पोषण सहायता (निकषय योजना)
डिजिटल ट्रैकिंग और फॉलो-अप जैसी सुविधाएं प्रदान कर रही है।
समाधान क्या है?
मरीजों के लिए काउंसलिंग और मनोवैज्ञानिक समर्थन
परिवार और समुदाय की भागीदारी बढ़ाना
माइग्रेशन करने वाले मरीजों के लिए ट्रैकिंग सिस्टम मजबूत करना
टीबी के प्रति सामाजिक कलंक खत्म करनाटीबी का इलाज अधूरा छोड़ना केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है। यदि हमें “टीबी मुक्त भारत” का लक्ष्य हासिल करना है, तो केवल दवा देना ही पर्याप्त नहीं—मरीज को पूरा सहयोग देना होगा। टीबी का इलाज मुफ्त है, लेकिन अधूरा इलाज समाज को बहुत महंगा पड़ता है। इससे संख्या नियंत्रण में भी दिक्कत आती है। सरकार के साथ मरीजों और उनके परिजनों को सहयोग देने की आवश्यकता है तभी टीबी के हराया जा सकता है।







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