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नयी दिल्ली। लापरवाही से एक मरीज की मौत के 25 साल पुराने मामले में दिल्ली की एक अदालत ने एक निजी अस्पताल पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। अदालत ने निजी अस्पताल की उन तमाम दलीलों को खारिज कर दिया, जिसमें अस्पताल प्रशासन का कहना था कि उनकी तरफ से कोई लापरवाही नहीं हुई। पीड़ित दिल की बीमारी का मरीज था और अचानक दिक्कत बढ़ने पर उसकी मौत हुई थी।
रोहिणी स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश किरण गुप्ता की अदालत ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि चिकित्सा पेशा सम्पूर्ण रूप से एक नोबल पेशा है, क्योंकि यह जिंदगी बचाने में सहायता करता है। आमतौर पर एक मरीज ऐसे प्रतिष्ठित डॉक्टर या अस्पताल का रुख करता है, जहां उसे भरोसा हो कि वहां उसे डॉक्टर और जीवन संरक्षण संबंधी यंत्र दोनों मिलेंगे, लेकिन अगर डॉक्टर से सही इलाज नहीं मिलता है, तो इसकी एक वजह अस्पताल भी होता है क्योंकि डॉक्टर की योग्यता को परखना और उसका सही उपयोग करना अस्पताल प्रशासन की जिम्मेदारी है।
वर्ष 1997 का मामला
पेशे से खुद डॉक्टर सुभाष गोयल को 5 फरवरी 1997 को छाती में दर्द की शिकायत पर एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 6 फरवरी 1997 की सुबह सुभाष गोयल की मौत हो गई थी। परिवार का आरोप था कि डॉक्टरों और अस्पताल प्रशासन की लापरवाही की वजह से उनकी मौत हुई। इस मामले में निचली अदालत ने अस्पताल प्रशासन को लापरवाही से मौत का दोषी करार दिया था।







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