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लखनऊ। रीजेंसी हेल्थ लखनऊ ने 72 वर्षीय कृष्ण चंद्र के मामले का सफलतापूर्वक प्रबंधन किया। मरीज को पेट के ऊपरी हिस्से में तेज दर्द और बार-बार उल्टी की शिकायत के साथ अस्पताल में भर्ती कराया था। जांच में उन्हें एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस पाया गया जो आगे चलकर श्वसन विफलता एक्यूट किडनी इंजरी निमोनिया यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन एन्सेफैलोपैथी और न्यूरोलॉजिकल कमजोरी जैसी गंभीर जटिलताओं से प्रभावित हुआ। मरीज का उपचार डॉ. प्रवीण झा DM गैस्ट्रोएंटरोलॉजी डॉ. सुमित वर्मा न्यूरोलॉजी तथा क्रिटिकल केयर टीम की देखरेख में किया गया। मरीज को 16 जून भर्ती किया गया। उन्हें सुबह से पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द और उल्टी की शिकायत थी। उनके मेडिकल इतिहास में पिछले चार वर्षों से COPD और पांच वर्ष पहले एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस का एपिसोड शामिल था। अस्पताल पहुंचने पर उनका ब्लड शुगर स्तर 357 mg/dl पाया गया।
जांच और पेट की अल्ट्रासोनोग्राफी में एक्यूट एडेमेटस पैंक्रियाटाइटिस के साथ पैंक्रियास के आसपास सूजन और इंफ्लेमेटरी बदलाव पाए गए। मरीज को तत्काल निगरानी में रखते हुए इंट्रावेनस फ्लूड्स, एंटीबायोटिक्स, प्रोटॉन-पंप इनहिबिटर्स, उल्टी रोकने की दवाएं, इंसुलिन, नेबुलाइजेशन, ह्यूमन एल्ब्यूमिन तथा अन्य आवश्यक सपोर्टिव उपचार शुरू किया गया। इलाज के दौरान मरीज की स्थिति और गंभीर हुई तथा उन्हें सांस लेने में काफी परेशानी और रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस होने लगा। शुरुआत में उन्हें नॉन-इनवेसिव वेंटिलेशन दिया गया, लेकिन पर्याप्त ऑक्सीजन सैचुरेशन बनाए रखना संभव नहीं होने पर उन्हें इंट्यूबेट कर मैकेनिकल वेंटिलेटर पर रखा गया।वेंटिलेटर पर रहने के दौरान मरीज में दोनों हाथों और पैरों में गंभीर कमजोरी विकसित हुई।
इलाज के दौरान मरीज की स्थिति गंभीर हुई तथा उन्हें सांस लेने में काफी परेशानी और रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस होने लगा। शुरुआत में उन्हें नॉन-इनवेसिव वेंटिलेशन दिया गया लेकिन पर्याप्त ऑक्सीजन सैचुरेशन बनाए रखना संभव नहीं होने पर उन्हें इंट्यूबेट कर मैकेनिकल वेंटिलेटर पर रखा गया। वेंटिलेटर पर रहने के दौरान मरीज में दोनों हाथों और पैरों में गंभीर कमजोरी विकसित हुई। क्लिनिकल मूल्यांकन के आधार पर LMN क्वाड्रिपेरेसिस/गिलियन-बैरे सिंड्रोम की संभावना जताई गई। मरीज अपने हाथ-पैरों को हिलाने में असमर्थ थे। आगे की नर्व कंडक्शन स्टडी और CSF जांच से GBS के निदान को समर्थन मिला। इसके बाद मरीज को IVIG (इंट्रावेनस इम्युनोग्लोबुलिन) दिया गया, जिसके बाद धीरे-धीरे उनकी न्यूरोलॉजिकल स्थिति में सुधार दिखाई देने लगा।
मरीज को लो ब्लड प्रेशर की समस्या भी हुई, जिसके लिए नॉरएड्रेनालिन सपोर्ट देना पड़ा। न्यूरोलॉजिकल जांच में बाएं फ्रंटल लोब में पुराना इंफार्क्ट, एन्सेफैलोपैथी से जुड़े बदलाव तथा मस्तिष्क में डिफ्यूज एट्रॉफी भी पाई गई। मरीज की स्थिति में एक और गंभीर मोड़ 25 जून को आया जब उन्हें अचानक ब्रैडीकार्डिया के बाद कार्डियक अरेस्ट हुआ। क्रिटिकल केयर टीम ने तत्काल ACLS AHA गाइडलाइंस के अनुसार CPR शुरू किया और आवश्यक आपातकालीन दवाएं दीं। टीम के त्वरित और समन्वित प्रयासों से मरीज को सफलतापूर्वक रिवाइव किया गया और उन्हें मैकेनिकल वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया। आगे की न्यूरोलॉजिकल जांच के लिए लम्बर पंचर किया गया तथा चेस्ट और लिम्ब फिजियोथेरेपी लगातार जारी रखी गई।
गहन क्रिटिकल केयर निरंतर मॉनिटरिंग और विभिन्न विशेषज्ञताओं की संयुक्त देखरेख में मरीज की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार होने लगा। 6 जुलाई 2026 को मरीज ने सफलतापूर्वक T-piece ट्रायल पूरा किया और उन्हें वेंटिलेटर से हटा दिया गया। इसके बाद वेंटिलेटर सपोर्ट को धीरे-धीरे कम किया गया और आवश्यकता के अनुसार इंटरमिटेंट NIV सपोर्ट दिया गया। हेमोडायनामिक रूप से स्थिर होने के बाद उन्हें पहले HDU और फिर सामान्य वार्ड में स्थानांतरित किया। मरीज ने उपचार और मल्टीडिसिप्लिनरी टीम द्वारा दिए गए सपोर्टिव केयर का अच्छा रिस्पॉन्स दिया। 18 जुलाई को डिस्चार्ज के समय मरीज को बुखार नहीं था, कोई नई शिकायत नहीं थी और उनके वाइटल पैरामीटर्स स्थिर थे।







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