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लखनऊ। मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल लखनऊ के डॉक्टरों ने गोंडा उत्तर प्रदेश के 41-वर्षीय एचआईवी पॉजिटिव मरीज का लिविंग डोनर किडनी ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक किया। यह मामला जटिल चिकित्सा परिस्थितियों में भी उन्नत ट्रांसप्लांट देखभाल की संभावनाओं को दिखाता है। मरीज को वर्ष 2018 में एचआईवी का पता चला था। इसके बाद उसकी किडनी की कार्यक्षमता धीरे-धीरे घटती गई और वह एंड-स्टेज रीनल डिजीज तक पहुंच गया। इस वजह से उसे 2023 से नियमित डायलिसिस कराना पड़ रहा था।
एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी पर रहने के बावजूद उसे ट्रांसप्लांट के विकल्प तलाशने में काफी दिक्कत हुई, क्योंकि प्रक्रिया की जटिलता को देखते हुए कई केंद्र आगे नहीं आए। जनवरी-26 में डॉक्टरों ने मरीज को मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल लखनऊ की ट्रांसप्लांट टीम के पास रेफर किया, यहां डॉ. वेंकटेश थम्मिशेट्टी, एसोसिएट डायरेक्टर नेफ्रोलॉजी एवं रीनल ट्रांसप्लांट फिजिशियन और डॉ. राहुल यादव व डॉ. आदित्य कुमार शर्मा, डायरेक्टर्स यूरोलॉजी एंड्रोलॉजी किडनी ट्रांसप्लांट एवं रोबोटिक यूरो-ऑन्कोलॉजी ने उनकी पूरी तरह से जांच कर स्थिति समझी और मूल्यांकन किया। जांच के बाद टीम ने उपचार की योजना बनाई, इस योजना में ट्रांसप्लांट के बाद की जरूरतों के मुताबिक उनकी एचआईवी थेरेपी में भी जरूरी बदलाव किए गए।

पत्नी ने डोनर के रूप में आगे आकर सहयोग किया और सभी जांचों में अनुकूलता मिलने के बाद डॉक्टरों ने ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक पूरा किया। मरीज की रिकवरी स्थिर रही, एक सप्ताह के भीतर उसे अस्पताल से छुट्टी मिल गई और अब उसे डायलिसिस की जरूरत नहीं है। मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल लखनऊ में नेफ्रोलॉजी एवं रीनल ट्रांसप्लांट फिजिशियन, एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. वेंकटेश थम्मिशेट्टी, ने कहा एचआईवी जैसी दूसरी बीमारियों के साथ ट्रांसप्लांट करना कई विशेषज्ञों के बीच बेहतर तालमेल और बेहद सावधानी से की गई मेडिकल प्लानिंग की जरूरत होती है।
सही प्रोटोकॉल और नियमित निगरानी के साथ ऐसे ट्रांसप्लांट सुरक्षित तरीके से किए जा सकते हैं और अच्छे परिणाम मिल सकते हैं। डॉ. राहुल यादव और डॉ. आदित्य कुमार शर्मा के नेतृत्व में सर्जिकल टीम ने बताया मरीज धीरे-धीरे सामान्य जीवन की ओर लौट रहा है और साथ ही इम्यूनोसप्रेसिव और एंटीरेट्रोवायरल दवाओं के साथ तय दवा योजना का पालन कर रहा है। डोनर और मरीज दोनों की स्थिति अच्छी है। यह मामला जटिल ट्रांसप्लांट स्थितियों को संभालने में बढ़ती चिकित्सा क्षमता को दर्शाता है और उन मरीजों के लिए उपचार के नए रास्ते खोलता है, जिन्हें पहले उच्च जोखिम की श्रेणी में रखा जाता था।







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