











































प्रतीकात्मक चित्र
गोरखपुर। पूर्वांचल के नामचीन शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. आर.एन. सिंह ने कहा है कि भारत में सभी के लिए फूड सिक्योरिटी के तहत देश की सत्ता 80 करोड जनता के लिए फ्री राशन की ब्यवस्था कर रही है। सबके लिए आवास की ब्यवस्था का भी अभियान है। इलाज के लिए सभी जरुतमंद और 70 साल से ऊपर के सभी सीनियर सिटीजन को आयुष्मान योजना के तहत पांच लाख रूपये की बीमा भी किया जा रहा है। देश के करोडों नवजात और शिशुओं के लिए फूड सिक्योरिटी के लिए अभी जो भी ब्यवस्था है, वह बडे प्रश्न खडा करती है।
डॉ. सिंह ने यहां जारी एक बयान में कहा कि देश में लाखों मौतें महज इसलिए हो जाती हैं कि नवजात शिशु को जन्म के आधे घंटे के भीतर मां का दूध नहीं मिल पाता। छह माह तक माताएं शिशु को केवल स्तनपान नहीं कराती हैं। यह कमी देश में लाखों मासूमों की मौत और खराब सेहत का कारण बनती है, जबकि कमी संसाधन की नहीं, हर मां शिशु के लिए दूध से संतृप्त है। यहां विकल्प सिर्फ सदियों से चली आ रही इस नैसर्गिक परंपरा को पुनः स्थापित करने की है।

डॉ. सिंह ने कहा कि नवजात शिशु और एक वर्ष तक के हर शिशु को सही पोषण के लिए समाज और सरकार को और गंभीरता से प्रयास करना होगा। यह ठीक है कि जन्म के आधे घंटे के भीतर स्तनपान शुरु कराने और छह माह तक केवल स्तनपान पर पोषित करने के लिए कई योजनाएं पहले से ही मौजूद हैं पर इन मानकों की बात करें तो परिणाम बेहद चिंताजनक हैं।
आर.एन. सिंह ने कहा कि देश में जन्म के आधे घंटे के अंदर स्तनपान की स्थिति सिर्फ 41% है। उत्तर प्रदेश में तो यह मात्र 22% है। इसी तरह छह माह तक केवल स्तनपान पर पोषण भी मात्र 65% है। इन दोनों खराब मानकों की वजह से देश और उत्तर प्रदेश में नवजात शिशु मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर बहुत अधिक है। विगत दशकों में इन दोनों मानकों मे उल्लेखनीय सुधार के बावजूद हम अभी विश्व के तमाम देशों से बहुत पिछडे हुए हैं। उन्होंने जापान का उदाहरण देते हुए कहा कि जापान, जिसे हमने अभी अर्थब्यवस्था में पिछाड दिया है उसका शिशु मृत्यु दर मात्र 2 प्रति हजार है और हम अभी बहत सुधार के बावजूद 24 प्रति हजार पर आ सके हैं। उत्तर प्रदेश की स्थिति और चिंता जनक है। यहां इंफैंट मार्टैलिटी रेट पैंतीस प्रति हजार से भी ऊपर है।

डॉ. सिंह ने कहा कि इस गहन समस्या का सरल हल उत्तर प्रदेश को बेबी फ्रेंडली स्टेट के रूप में विकसित कर देने से हो सकता है। साथ ही प्रसव को सौ फीसदी संस्थागत करना और प्रसूता की प्रसव पूर्ण जांच, पोषण, टीकाकरण आदि भी आवश्यक है। प्रसव पूर्ण प्रसूता को स्तनपान के महत्व और तकनीक की जानकारी आदि भी शिशु की सेहय और सलामती के लिए महत्वपूर्ण बिंदु हैं।
उन्होंने कहा कि बेबी फ्रेंडली हेल्थ इनिशिएटिव विश्व स्वास्थ संगठन और यूनिसेफ की एक वैश्विक पहल है जिसके दस स्टेप्स का पालन करके कोई भी अस्पताल नर्सिंग होम आदि बेबी फ्रेंडली स्टेटस प्राप्त कर सकते हैं। मिशन सेव इन इंडिया पूरे उत्तर प्रदेश को बेबी फ्रेंडली स्टेट बनाये जाने की मांग कर रहा है। इससे यूपी का नवजात शिशु मृत्यु दर और अंडर फाइव मृत्यु दर लगभग तीस प्रतिशत तक कम हो जायेगा। मातृ मृत्यु दर में भी कमी आयेगी। बाल मृत्यु दरों में कमी आने पर हमारा प्रदेश भी गर्व करेगा। मिशन 2030 में नवजात शिशु मृत्यु दर को बारह प्रति हजार और अंडर फाइव मृत्यु दर को पचीस प्रति हजार तक कम करने के लक्ष्य को साधने में भी बेबी फ्रेंडली उत्तर प्रदेश परियोजना बहुत सहायक सिद्ध होगी।







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