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लखनऊ। सांस फूलना और जल्दी थक जाना कई बार सामान्य समस्या लग सकती है, लेकिन इसके पीछे पल्मोनरी हाइपरटेंशन जैसी गंभीर स्थिति भी हो सकती है। विशेषज्ञों ने लोगों से ऐसे लक्षणों को नजरअंदाज न करने और समय रहते चिकित्सकीय जांच कराने की सलाह दी है। केजीएमयू में आयोजित पीएच समिट-2026 में देश-विदेश से जुटे विशेषज्ञों ने पल्मोनरी हाइपरटेंशन के शीघ्र निदान, जोखिम के आकलन और आधुनिक उपचार पर चर्चा की। केजीएमयू के पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के प्रमुख प्रो. वेद प्रकाश ने कहा कि पल्मोनरी हाइपरटेंशन का पता अक्सर बीमारी के काफी आगे बढ़ जाने के बाद चलता है। सांस फूलना इसका प्रमुख संकेत हो सकता है। उन्होंने कहा कि बीमारी की जल्द पहचान होने पर मरीज को समय पर उचित उपचार दिया जा सकता है।
प्रो. वेद प्रकाश बताया कि पल्मोनरी हाइपरटेंशन फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं से जुड़ी स्थिति है। इसमें फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं में दबाव बढ़ जाता है और हृदय के दाहिने हिस्से को रक्त को फेफड़ों तक पहुंचाने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ सकती है। इसके कारण सांस फूलना, थकान, चक्कर आना, सीने में दर्द और गंभीर मामलों में बेहोशी जैसे लक्षण हो सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार पल्मोनरी हाइपरटेंशन एक अकेली बीमारी नहीं है। यह अलग-अलग कारणों और बीमारियों से जुड़ा हो सकता है। बाईं ओर के हृदय रोग, पुरानी फेफड़ों की बीमारियां, लंबे समय तक ऑक्सीजन की कमी और फेफड़ों में पुराने रक्त के थक्के इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं। कुछ मरीजों में यह पल्मोनरी आर्टेरियल हाइपरटेंशन के रूप में सामने आता है, जबकि कुछ मामलों में कारण स्पष्ट नहीं होता। बीमारी की जांच के लिए मरीज की मेडिकल हिस्ट्री और शारीरिक जांच के साथ ईसीजी, चेस्ट एक्स-रे, इकोकार्डियोग्राफी, लंग फंक्शन टेस्ट और जरूरत के अनुसार सीटी, एमआरआई तथा वी/क्यू स्कैन जैसी जांच की जाती हैं। राइट-हार्ट कैथीटेराइजेशन से फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं और हृदय के बीच रक्तचाप की स्थिति का प्रत्यक्ष आकलन किया जा सकता है और यह पल्मोनरी हाइपरटेंशन की पुष्टि के लिए महत्वपूर्ण जांच है।
इलाज बीमारी के प्रकार और उसके कारण पर निर्भर करता है। मरीजों को आवश्यकता के अनुसार दवाएं ऑक्सीजन और अन्य उपचार दिए जाते हैं। कुछ विशेष स्थितियों में सर्जरी या इंटरवेंशनल उपचार की जरूरत पड़ सकती है। क्रोनिक थ्रोम्बोएम्बोलिक पल्मोनरी हाइपरटेंशन (सीटीईपीएच) के कुछ मरीजों में पल्मोनरी एंडार्टरेक्टॉमी या बैलून पल्मोनरी एंजियोप्लास्टी जैसे उपचार विकल्प हो सकते हैं। बहुत गंभीर मामलों में ट्रांसप्लांटेशन पर भी विचार किया जा सकता है। कार्यक्रम में बीमारी के देर से पता चलने की स्थिति में तीन साल तक जीवित रहने की संभावना करीब 55 प्रतिशत रहने और उन्नत बीमारी में लंग या हार्ट-लंग ट्रांसप्लांटेशन की जरूरत पड़ने की बात कही गई।
केजीएमयू के पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग की ओर से आयोजित दो दिवसीय पीएच समिट-2026 में पल्मोनरी हाइपरटेंशन के विभिन्न प्रकार, आधुनिक जांच, जोखिम का आकलन, दवाओं, सीटीईपीएच, इमेजिंग, गंभीर मरीजों की गहन चिकित्सा और ईसीएमओ जैसे विषयों पर वैज्ञानिक सत्र हुए। उद्घाटन समारोह में एम्स ऋषिकेश के पूर्व निदेशक और केजीएमयू के पूर्व कुलपति पद्मश्री प्रो. डॉ. रवि कांत मुख्य अतिथि रहे। आयोजन समिति के अध्यक्ष पद्मश्री प्रो. डॉ. राजेंद्र प्रसाद और आयोजन सचिव प्रो. डॉ. वेद प्रकाश सहित विशेषज्ञ मौजूद रहे। सम्मेलन में अमेरिका के डॉ. संदीप सहाय और आयरलैंड के डॉ. सैयद रेहान क्वादेरी के अलावा डॉ. दिगंबर बेहरा, डॉ. ध्रुव चौधरी, डॉ. शुभाकर कंडी, डॉ. जूलियस पुन्नेन, डॉ. प्रकाश एस., डॉ. प्रशांत बोभाटे, डॉ. मांसी गुप्ता, डॉ. सत्यवीर यादव, डॉ. अदिति सिंघवी, डॉ. विकास अग्रवाल, डॉ. गौरव चौधरी, डॉ. बाशा जलाल खान, डॉ. जफर नियाज, डॉ. अपार जिंदल, डॉ. राहुल चंदोला और डॉ. अभिषेक टंडन सहित कई विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक विषयों पर विचार रखे। इनमें पल्मोनरी वैस्कुलर फिजियोलॉजी, रिस्क स्ट्रैटिफिकेशन, राइट-हार्ट कैथीटेराइजेशन, मल्टी-मोडैलिटी इमेजिंग, सीटीईपीएच और गंभीर पल्मोनरी हाइपरटेंशन में उन्नत उपचार जैसे विषय शामिल रहे।
पल्मोनरी हाइपरटेंशन का जल्द पता लगाने और इसकी रोकथाम के लिए जोखिम कारकों को जानना ज़रूरी है। जिन लोगों में इनमें से एक या ज़्यादा जोखिम कारक हैं, उन्हें अपनी सेहत पर बारीकी से नज़र रखनी चाहिए। अगर उन्हें बिना किसी साफ़ वजह के सांस फूलने, थकान या सीने में दर्द जैसे लक्षण महसूस हों, तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। इन जोखिम कारकों में शामिल हैं:-उम्र: पल्मोनरी हाइपरटेंशन (PH) किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन इसका पता अक्सर 30 से 60 साल की उम्र के बीच चलता है। उम्र बढ़ने के साथ दिल और रक्त वाहिकाओं में बदलाव के कारण इसका जोखिम बढ़ जाता है। पर्यावरण लंबे समय तक हानिकारक पदार्थों (जैसे एस्बेस्टस) के संपर्क में रहने या परजीवियों (पैरासाइट्स) से होने वाले संक्रमण से फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुँच सकता है, जिससे पल्मोनरी हाइपरटेंशन (PH) का जोखिम बढ़ जाता है।
पारिवारिक इतिहास और जेनेटिक्स: डाउन सिंड्रोम, जन्मजात हृदय रोग, गौचर रोग जैसी आनुवंशिक स्थितियां और खून के थक्के जमने का पारिवारिक इतिहास, पल्मोनरी हाइपरटेंशन (PH) का जोखिम बढ़ा सकते हैं।
जीवनशैली की आदतें: धूम्रपान और गैर-कानूनी नशीली दवाओं के इस्तेमाल से दिल और फेफड़ों को नुकसान पहुँच सकता है, जिससे सूजन हो सकती है और फेफड़ों में दबाव बढ़ सकता है। दवाएं: कैंसर और डिप्रेशन की कुछ दवाएं फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं को प्रभावित कर सकती हैं और पल्मोनरी हाइपरटेंशन का जोखिम बढ़ा सकती हैं। लिंग: पुरुषों की तुलना में महिलाओं में पल्मोनरी हाइपरटेंशन (PH) होने की संभावना ज़्यादा होती है, खासकर हार्ट फेलियर या अज्ञात कारणों (इडियोपैथिक) से होने वाले मामलों में; ऐसा शायद हार्मोन या ऑटोइम्यून बीमारियों के कारण हो सकता है।







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