












































Dr. Jatin Yadav, a senior consultant surgical oncologist at Regency Health, Kanpur
कानपुर। ब्रेस्ट कैंसर जागरूकता माह के अवसर पर रीजेंसी हेल्थ (कानपुर) ब्रेस्ट कैंसर के इलाज के परिणामों को सुधारने के लिए समय पर पहचान के महत्व पर प्रकाश डाल रहा है और महिलाओं को प्रोत्साहित कर रहा है कि वे स्तन में किसी भी प्रकार का असामान्य बदलाव देखने पर बिना देरी किए डॉक्टर से सलाह लें। बीमारी का पता किस स्टेज पर चलता है, इससे इलाज का फैसला तय हो सकता है, इसलिए जागरूकता और सही जांच सुविधाओं की उपलब्धता होना ब्रेस्ट कैंसर की देखभाल का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) के GLOBOCAN 2024 के अनुमान के मुताबिक भारत में ब्रेस्ट कैंसर के 2,37,231 नए मामले दर्ज किए गए हैं। इस आंकड़े के साथ यह देश में महिलाओं में सबसे ज़्यादा होने वाला कैंसर बन गया है।
यह आंकड़ा समय पर बीमारी की पहचान और इलाज की सभी सुविधा उपलब्ध कराने की ज़रूरत को और भी स्पष्ट करता है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन के ग्लोबल ब्रेस्ट कैंसर इनिशिएटिव का उद्देश्य बेहतर शुरुआती पहचान समय पर डायग्नोसिस और पूरे कैंसर मैनेजमेंट के ज़रिए 2040 तक दुनिया भर में ब्रेस्ट कैंसर से होने वाली मौत की दर को हर साल 2.5% कम करना है। ब्रेस्ट कैंसर के उपचार में एक बड़ी चुनौती यह है कि बीमारी के शुरुआती स्टेज में दर्द नहीं होता है। अगर गांठ से कोई परेशानी नहीं होती है या महिला की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर असर नहीं पड़ता है, तो महिलाएं डॉक्टर से कंसल्टेशन नहीं कराती हैं। हालांकि दर्द न होने का मतलब यह नहीं है कि कैंसर नहीं है। लक्षणों के स्पष्ट होने का इंतज़ार करने से बीमारी की पहचान में देरी हो सकती है।
रीजेंसी हेल्थ कानपुर के ऑन्कोलॉजिस्ट सर्जिकल सीनियर कंसलटेंट डॉ जतिन यादव ने कैंसर के जल्दी पहचान के महत्व पर बात करते हुए कहा, “ब्रेस्ट कैंसर का इलाज कई बातों पर निर्भर करता है, जिसमें बीमारी का स्टेज उसकी बायोलॉजिकल विशेषताएं और मरीज़ की संपूर्ण सेहत मायने रखती है। सही डायग्नोसिस से हमें हर मरीज़ के लिए सबसे सही इलाज का तरीका तय करने में मदद मिलती है। जब कैंसर का पता शुरुआती स्टेज में चल जाता है, तो इलाज के ज़्यादा विकल्प मिल सकते हैं, हालांकि हर मरीज़ के चिकित्सीय नतीजों के हिसाब से तरीका अलग-अलग होता है। सही देखभाल की प्लानिंग के लिए बीमारी कितनी बड़ी है और उसके लक्षणों का पता लगाना ज़रूरी होता है।
ब्रेस्ट कैंसर के चेतावनी वाले संकेतों में स्तन या अंडरआर्म में नई गांठ होना या मोटा होना, स्तन के आकर या बनावट में बदलाव होना, त्वचा में गड्ढे पड़ना, निप्पल का उल्टा होना और निप्पल से असामान्य डिस्चार्ज होना आदि शामिल हैं। ये बदलाव नॉन-कैंसरस स्थिति की वजह से भी हो सकते हैं, लेकिन चिकित्सीय जांच से इनका कारण पता लगाने में मदद मिल सकती है। मरीज़ की उम्र, लक्षणों और जांच के नतीजों के आधार पर डॉक्टर डायग्नोसिस सुनिश्चित करने के लिए मैमोग्राफी, अल्ट्रासाउंड या बायोप्सी की सलाह दे सकते हैं। एक बार जब ब्रेस्ट कैंसर कंफर्म हो जाता है तो आगे की जांच की जाती है जिससे कि कैंसर का स्टेज और बायोलॉजिकल विशेषताएं पता चलती है। इससे सर्जरी रेडिएशन थेरेपी कीमोथेरेपी हार्मोन थेरेपी या टारगेटेड मेडिसिंस से संबंधित फैसले लेने में मदद मिलती है। इलाज़ योजना में मरीज़ की पूरी सेहत और पसंद का भी ध्यान रखा जाता है।
हालांकि पहले पता चलने पर इलाज के विकल्प बढ़ सकते हैं, लेकिन इलाज का दायरा और संभावित नतीजे कैंसर के प्रकार और स्टेज के हिसाब से अलग-अलग होते हैं। स्क्रीनिंग की सलाह महिला की उम्र उसके व्यक्तिगत जोखिम और लागू मेडिकल गाइडलाइंस के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। महिलाओं को अपने लिए सही स्क्रीनिंग विकल्प जानने के लिए डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए खासकर अगर परिवार में पहले कैंसर के मामले रहे हों या उनमें अन्य जोखिम फैक्टर मौजूद हों तो डॉक्टर से कंसल्ट करना चाहिए। स्क्रीनिंग का उद्देश्य लक्षण दिखाई देने से पहले ही संभावित बीमारी का पता लगाना है, जबकि डायग्नोस्टिक जांच का इस्तेमाल लक्षणों या स्क्रीनिंग में मिले संदिग्ध नतीजों की पुष्टि के लिए किया जाता है। अपने इस ब्रेस्ट कैंसर जागरूकता माह पहल के माध्यम से रीजेंसी हेल्थ कानपुर जांच से सम्बंधित फैसलों और सही ब्रेस्ट कैंसर देखभाल पर जागरूकता बढ़ा रहा है।







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