











































Dr. Yuthika Bajpai Director and Specialist in IVF and Reproductive Medicine at Regency Health Kanpur
कानपुर। जेनिटल ट्यूबरकुलोसिस की वजह से फैलोपियन ट्यूब बुरी तरह खराब हो जाने के बावजूद एक महिला ने कानपुर के रीजेंसी हेल्थ में IVF स्टिमुलेशन के एक ही साइकल के बाद चार स्वस्थ बच्चों को जन्म दिया और अपने माँ बनने के सपनो को साकार किया। IVF और रिप्रोडक्टिव मेडिसिन की स्पेशलिस्ट और डायरेक्टर डॉ. युथिका बाजपेयी की देखरेख में फ्रेश IVF साइकल में दो एम्ब्रियो (भ्रूण) ट्रांसफर किए जाने के बाद उन्हें सबसे पहले जुड़वां बेटियां हुईं। बाकी बचे आठ एम्ब्रियो को क्रायोप्रिजर्व यानी ठंडा करके सुरक्षित किया गया था। इनमें से दो का इस्तेमाल दो साल बाद फ्रोज़न एम्ब्रियो ट्रांसफर (FET) के ज़रिए किया गया। इससे दूसरी बार जुड़वां बच्चे (एक लड़का और एक लड़की) पैदा हुए।
मरीज़ को शुरू में प्राइमरी इनफ़र्टिलिटी थी। यह समस्या होने पर महिला गर्भधारण नहीं कर पा रही थी। जाँच में उन्हें एक्टिव जेनिटल ट्यूबरकुलोसिस का पता चला। इसके कारण उनकी दोनों फ़ैलोपियन ट्यूब बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थीं। उन्होंने एंटी-ट्यूबरकुलर थेरेपी (ATT) लिया लेकिन फिर जब जाँच हुई तो पता चला कि ट्यूब का क्षतिग्रस्त होना स्थायी था। इससे प्राकृतिक रूप से गर्भधारण की संभावना बहुत कम हो गई थी। इसलिए उन्हें इन विट्रो फ़र्टिलाइज़ेशन (IVF) कराने की सलाह दी गई। इस प्रक्रिया में फ़ैलोपियन ट्यूब की ज़रूरत नहीं पड़ती और एम्ब्रियो को सीधे गर्भाशय में ट्रांसफ़र किया जा सकता है। IVF साइकल के दौरान कंट्रोल्ड ओवेरियन स्टिमुलेशन से 10 अच्छे एम्ब्रियो बने। मेडिकल टीम ने फ्रेश साइकल में दो एम्ब्रियो ट्रांसफर किए, जिससे जुड़वां बेटियों का जन्म हुआ। बाकी आठ अच्छी क्वालिटी वाले एम्ब्रियो को दंपत्ति के भविष्य में इस्तेमाल के लिए क्रायोप्रिजर्व कर दिया गया।
दो साल बाद दंपत्ति एक और गर्भावस्था के लिए दुबारा आया। क्रायोप्रिजर्व्ड एम्ब्रियो में से दो को पिघलाकर FET साइकल के ज़रिए ट्रांसफ़र किया गया। इस गर्भावस्था से फिर एक लड़के और एक लड़की का जन्म हुआ। बड़े जुड़वां बच्चे अब नौ साल के हैं और छोटे जुड़वां बच्चे छह साल के हैं। चारों बच्चे स्वस्थ हैं। रीजेंसी हेल्थ कानपुर की IVF और रिप्रोडक्टिव मेडिसिन की स्पेशलिस्ट और डायरेक्टर डॉ. युथिका बाजपेयी ने बताया इस मामले की खास अहमियत इस बात में है कि एम्ब्रियो क्रायोप्रिजर्वेशन दंपतियों को एक से ज्यादा बच्चे की योजना बनाने का विकल्प देता है। पहले साइकल में सुरक्षित रखे गए एम्ब्रियो की मदद से यह दंपति अपनी सुविधा और तैयारी के अनुसार दूसरी गर्भावस्था के लिए बाद में वापस आ पाए। साथ ही डॉक्टरों को एम्ब्रियो ट्रांसफर की योजना अलग से बनाने की सुविधा मिली। यह तरीका खास तौर पर उन मामलों में फायदेमंद हो सकता है, जहाँ बार-बार ओवेरियन स्टिमुलेशन और एग रिट्रीवल की प्रक्रिया से बचना हो। इससे मरीज़ के लिए इलाज की पूरी प्रक्रिया आसान और सुविधाजनक हो जाती है।
यह मामला दिखाता है कि एक बार स्टिमुलेशन के बाद तैयार किए गए अच्छे एम्ब्रियो को सुरक्षित रखकर जरूरत के अनुसार अलग-अलग समय पर ट्रांसफर किया जा सकता है। एक बार एग निकालने की प्रक्रिया से मिले एम्ब्रियो का इस्तेमाल एक से ज़्यादा गर्भावस्था के लिए करने से दम्पत्तियों को बार-बार एग निकालने की प्रक्रिया से नहीं गुज़रना पड़ता। साथ ही अलग-अलग साइकिल में सीमित संख्या में एम्ब्रियो ट्रांसफर करने से एक साथ कई बच्चों (जैसे तीन या चार) के जन्म की संभावना कम हो जाती है। ऐसी गर्भावस्था में समय से पहले जन्म, जन्म के समय कम वज़न और माँ को होने वाली जटिलताओं का खतरा ज़्यादा होता है। FET में नए सिरे से एम्ब्रियो बनाने के बजाय पहले से क्रायोप्रिजर्व एम्ब्रियो को बाद के साइकल में ट्रांसफर किया जाता है। इससे आगे के इलाज में फोकस एम्ब्रियो ट्रांसफर के लिए गर्भाशय को तैयार करने पर केंद्रित किया जा सकता है, और इसके लिए फ्रेश IVF साइकल में ज़रूरी ओवेरियन स्टिमुलेशन की ज़रूरत नहीं पड़ती।
ओवेरियन हाइपरस्टिमुलेशन सिंड्रोम (OHSS) के खतरे को कम करने के लिए पूरी IVF प्रक्रिया के दौरान सही इलाज का तरीका और निगरानी ज़रूरी होती है। रीजेंसी हेल्थ कानपुर का केस दिखाता है कि कैसे एम्ब्रियो क्रायोप्रिजर्वेशन पहली IVF गर्भावस्था के बाद भी फैमिली प्लानिंग में मदद कर सकता है, जिससे दम्पत्तियों को वायबल एम्ब्रियो को प्रिजर्व करने और बाद में अपने रिप्रोडक्टिव प्लान और क्लीनिकल सूटेबिलिटी के आधार पर उनका इस्तेमाल करने का विकल्प मिलता है। रीजेंसी हॉस्पिटल क्रायोप्रिजर्वेशन प्रोग्राम 2009 में शुरू हुआ था, और पहला फ्रोजन एम्ब्रियो बेबी 2010 में पैदा हुआ था। इत्तेफाक से यह अवध क्षेत्र का पहला फ्रोजन एम्ब्रियो बेबी था।







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