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भारत में स्ट्रोक की रोकथाम के लिए टोबैको पर निर्भरता को कम करना जरूरी: डॉ. यशपाल सिंह बुंदेला

टोबैको का सेवन इतने व्यापक तौर पर होता है कि यह जनस्वास्थ्य की एक बड़ी चिंता बन गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक टोबैको के सेवन के कारण भारत में हर साल लगभग 1.35 मिलियन मौतें होती हैं। देश में टोबैको का सेवन सिगरेट के अलावा बीड़ी, खैनी, गुटखा और जर्दा के रूप में भी होता है। इसलिए इसकी रोकथाम की नीतियों में टोबैको सेवन के अलग-अलग तरीकों पर भी गौर करना जरूरी है, तभी हर समुदाय के लोगों तक टोबैको छोड़ने के लिए सपोर्ट पहुँचाई जा सकेगी।

हुज़ैफ़ा अबरार
October 29 2026 Updated: October 29 2026 16:51
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भारत में स्ट्रोक की रोकथाम के लिए टोबैको पर निर्भरता को कम करना जरूरी: डॉ. यशपाल सिंह बुंदेला Image of World Stroke day

नई दिल्ली। भारत में स्ट्रोक और कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों के बहुत अधिक मामले पाए जाते हैं, इसलिए लोगों को स्वस्थ रखने के लिए इनके कारणों की रोकथाम करना बहुत जरूरी है। टोबैको का इस्तेमाल इन बीमारियों का सबसे प्रमुख कारण है। वर्ल्ड स्ट्रोक डे के अवसर पर एक्सपर्ट्स टोबैको कंट्रोल के ज्यादा मजबूत और विस्तृत दृष्टिकोण को अपनाने का आग्रह कर रहे हैं। उनके मुताबिक इस बारे में केवल जागरूकता बढ़ाया जाना ही काफी नहीं है, बल्कि निकोटीन पर निर्भरता कम करने, इसकी लत को छोड़ने में मदद करने वाले साधनों की उपलब्धता बढ़ाने और रोकथाम के उपायों को मजबूत किए जाने की आवश्यकता है।2024 में ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज डेटा के अनुसार भारत में स्ट्रोक से होने वाली 12% मौतों का कारण टोबैको का सेवन था, वहीं हाई सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर के कारण 56% मौतें हुईं।

ये नतीजे स्ट्रोक और कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों की रोकथाम के लिए अन्य जोखिमों के साथ-साथ टोबैको की रोकथाम पर भी जोर देते हैं। डॉ. यशपाल सिंह बुंदेला डायरेक्टर ऑफ न्यूरोसर्जरी एंड न्यूरोसाइंसेज मेदांता सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, नोएडा ने कहा, “ऐसा नहीं है कि लोगों से टोबैको की लत छोड़ने को कह दिया और काम हो गया। भले ही लोगों को नुकसान के बारे में कितना भी पता क्यों ना हो, पर निकोटीन की लत को छोड़ना मुश्किल होता है। टोबैको के कारण होने वाली बीमारियां लोगों के स्वास्थ्य को गंभीर खतरा उत्पन्न करती हैं, इसलिए हमें इसकी रोकथाम के लिए तुरंत कदम उठाने की जरूरत है। हमें लोगों की सिगरेट की आदत छुड़ाने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। इसके लिए हमें प्रैक्टिकल और रोकथाम में लगातार मदद करने वाले उपायों की मदद लेनी होगी। साथ ही निकोटीन रिप्लेसमेंट थेरेपी (NRT) जैसे क्लिनिकली प्रमाणित तरीकों की उपलब्धता बढ़ानी होगी। यह बदलाव आसान नहीं होगा, लेकिन हमें कहीं ना कहीं से तो शुरुआत करनी होगी।

जागरूकता बढ़ाने से आगे बढ़कर अब प्रमाण पर आधारित सपोर्ट उपलब्ध कराए जाने की जरूरत है, तभी हम टोबैको के इस्तेमाल में कमी लाने और उससे जुड़ी बीमारियों की रोकथाम करने में समर्थ बनेंगे। टोबैको का सेवन इतने व्यापक तौर पर होता है कि यह जनस्वास्थ्य की एक बड़ी चिंता बन गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक टोबैको के सेवन के कारण भारत में हर साल लगभग 1.35 मिलियन मौतें होती हैं। देश में टोबैको का सेवन सिगरेट के अलावा बीड़ी, खैनी, गुटखा और जर्दा के रूप में भी होता है। इसलिए इसकी रोकथाम की नीतियों में टोबैको सेवन के अलग-अलग तरीकों पर भी गौर करना जरूरी है, तभी हर समुदाय के लोगों तक टोबैको छोड़ने के लिए सपोर्ट पहुँचाई जा सकेगी।अन्य देशों में मिले अनुभवों से हम टोबैको कंट्रोल की नीतियों को मजबूत बनाने के लिए महत्वपूर्ण सीख ले सकते हैं। जापान में किया गया एक अध्ययन, जो 2026 में प्रकाशित हुआ, में यह सामने आया कि 15 से 64 साल के लोगों के बीच टोबैको का सेवन 2017 में 20.7% से गिरकर 2025 में 12.3% रह गया। वहीं, हीटेड टोबैको का सेवन 5.3% से बढ़कर 11.7% हो गया।

सभी तरह के टोबैको प्रोडक्ट्स के कुल सेवन में कुछ कमी आई, पर इनका दोहरा उपयोग बढ़ा। ये नतीजे टोबैको के इस्तेमाल का बदलता पैटर्न प्रदर्शित करते हैं, लेकिन इनसे यह स्थापित नहीं होता है कि हीटेड टोबैको के इस्तेमाल से सिगरेट के सेवन में कमी आई  या कार्डियोवैस्कुलर और स्ट्रोक का दीर्घकालिक जोखिम कम हुआ। इनसे अन्य देशों में मिले अनुभवों की जाँच करने और भारतीय संदर्भ में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर उनके प्रभाव का आकलन करने का महत्व प्रदर्शित होता है।वर्ल्ड स्ट्रोक डे हमें याद दिलाता है कि स्ट्रोक और कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों के जोखिम को कम करने के लिए टोबैको एवं अन्य खतरों जैसे हाई ब्लड प्रेशर की निरंतर रोकथाम करना जरूरी है। टोबैको की लत छोड़ने के लिए सपोर्ट बढ़ाने, टोबैको की शुरुआत को रोकने और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यों के प्रमाण पर आधारित नतीजों से भारत को टोबैको से होने वाली बीमारियों को रोकने की प्रभावशाली योजना बनाने और भावी पीढ़ियों के स्वास्थ्य की रक्षा करने में मदद मिलेगी।

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